Posts

क्या महज़ नास्तिक होना गलत है, पाप है?

 "सर, मैं किसी भगवान को नहीं मानती, कोई तीर्थ यात्रा नहीं करती ना ही किसी धार्मिक किताब में मेरा यक़ी है। क्या मैं गलत हूँ?"  पिछले शनिवार आश्रम में एक महिला ने मुझसे यह सवाल किया।  सवाल अहम था।  क्या महज़ नास्तिक होना गलत है, पाप है?  बिल्कुल नहीं।  मैंने बेशुमार ऐसे ख़ुदा-परस्त भी देखे हैं जो ज़्यादातर वक़्त मंदिरों, मस्जिदों में गुज़ारते हैं, हर धार्मिक समागम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं पर दिल के बेहद मैले हैं।  मक्कारी बेइंतहा है, ईर्ष्या है, सिरे का लालच है, चुगलखोर हैं, दूसरों के लिए दिल में सिर्फ बेरहमी है।  मुझे याद है कुछ वक़्त पहले मैं पैदल रास्ते पर चल रहा था। अचानक पीछे से तेज़ रफ़्तार बाइक निकली, मैं ब-मुश्किल बचा।  गुस्से में मैंने बाइक सवार को ठेठ पंजाबी में "कर्णप्रिय" श्लोक सुनाए, रुकने को कहा।  बाइक सवार थोड़ी दूरी पर रूका। मैं उसके पास गया। देखा कि वह धार्मिक वेशभूषा में है।  "आपको शर्म आनी चाहिए। एक धर्म गुरु होने के नाते आप का कर्तव्य है कि आप क़ानून की पालना कर के मिसाल क़ायम करें। क्या आपको मालूम है कि इस त...

बुढ़ापे में आर्थिक स्वतंत्रता ज़रूरी है

 मेरे एक जानकार ने कई रोज़ पहले दर्दनाक किस्सा सुनाया।  दिल्ली में एक मकान से बदबू आ रही थी। पड़ोसियों ने पुलिस को इत्तिला दी। दरवाज़े को तोड़ा गया, पुलिस ने देखा कि उम्रदराज़ मकान मालिक का शव बिस्तर पर पड़ा था। मौत की वजह - हार्ट अटैक।  पड़ोसियों ने बताया कि कई मर्तबा वे ही बुज़ुर्ग को खाना, दवाइयाँ खरीद कर देते थे।  अलमारी खोलने पर एक डायरी मिली जिसमें उसके बेटे और बेटी का फोन नंबर था।  बेटा अमेरिका में बहुत बड़ा डाक्टर है। फोन करने पर उसने कहा, "इस लाश के लिए मैं क्या सारे काम छोड़कर आऊं। आप ने जो इस का करना है कर दिजिए।"  मुंबई में रह रही बेटी का जवाब था, "मैं शादीशुदा हूँ, दो बच्चे हैं। अपने हस्बैंड, बच्चों को देखना पड़ता है। सॉरी, मैं वक़्त नहीं निकाल सकती।"  क्या आप जानते हैं कि भारतीयों में सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी क्या है?  एक आम भारतीय अपने बच्चों की बेहतरीन परवरिश, तालीम, शादी पर बेइंतहा खर्च करता है। सोचता है कि ये सब लान्ग टर्म इन्वेस्टमेंट है, मुनासिब रिटर्न उसे बुढ़ापे में मिलेगा जब वह कमाने योग्य नहीं होगा।  बस यही सोच सबसे बड़ी भ्...

ये सारी क़ायनात वक़्त के इख़्तियार में है

 ये सारी क़ायनात वक़्त के इख़्तियार में है। वक़्त सब कुछ बदल देता है -  हालात, विचार।  मैंने १९८६ में दसवीं जमात पास की, सरकार ने १०+२ सिस्टम लागू कर दिया।  स्कूलों में १०+२ जमातों को पढ़ाने का बंदोबस्त नहीं था सो मैंने डीएवी कालेज, सैक्टर १०, चंडीगढ़ में दाखिला लेने की सोची।  इसी कॉलेज में पॉंच साल पढ़ा - दो साल १०+२, तीन साल बी ए आनर्स।  विषयों के बारे में इल्म नहीं था सो आर्ट्स के विषय फार्म में भर दिए।  उस वक़्त कॉलेज के प्रिंसिपल डा. किशन सिंह आर्य जी थे।  उन्होंने मुझे, एक और लड़के समीर पाल सिंह को अपने दफ़्तर में बुलाया।  "बेटा, आप के तो दसवीं में बहुत अच्छे नंबर हैं, आर्ट्स क्यों भरा? मैं आपको नॉन मेडिकल दे रहा हूँ।"  उसी वक़्त समीर पाल सिंह से मेरी पहली मुलाक़ात हुई जो बाद में पक्की दोस्ती में तब्दील हुई।  समीर द लॉरेंस स्कूल - सनावर, कसौली (हिमाचल प्रदेश) से दसवीं तक पढ़ा था। पिता जी के सिलीगुड़ी (वेस्ट बंगाल) में चाय के बागान थे। अमीर बाप का बेटा पर बेहद विनम्र।  +२ में मेरे नंबर बेहतरीन आए पर ना जाने क्यों साइंस विष...

कर्मों का हिसाब किताब

मेरे एक पुराने दोस्त ने मुझ से अपना दर्द सांझा किया, "शर्मा जी, मैं जिंदगी से बेहद तंग हूँ। दफ़्तर से घर जाने को ज़रा भी मन नहीं करता। अब दो-तीन साल बाद मेरी रिटायरमेंट है। सोच कर भी ख़ौफ़ लगता है कि फिर मै मुक्कमल वक़्त जहन्नुम जैसे घर में कैसे बिताऊंगा।"  "घर तो आदमी सुकूँ के पलों के लिए ही जाता है। पर आप को घर जहन्नुम क्यों लगता है। मैं कुछ समझा नहीं। खुल कर बताईये।"  "दोस्त, आप को तो पता है कि मेरे दो बच्चे हैं, बेटा और बेटी। बदक़िस्मती से दोनों ही मेरे इख़्तियार में नहीं है। बेटी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही है। बेटे ने तालीम मुकम्मल कर ली है। ना वह नौकरी करता है, ना कोई बिजनेस। दोनों के रईसी शौंक है - महंगे कपड़े, गाड़ियां, महंगे होटलों, शराब खानों में जाना। रात को बहुत लेट या फिर सुबह ही शराब के नशे में घुत हो कर घर वापस आते हैं। मेरी पत्नी इन दोनों की हरकतों की वजह से परेशान रहती है, बीमार रहती है।"  "पर आप इन्हों को पैसे क्यों देते हो।"  "अगर पैसे ना दूं तो झगड़ा करते हैं, गालियाँ देते हैं, घर छोड़ कर जाने की धमकी देते हैं। समाज में अपनी...

यह कैसी सुहागिन

अक़्सर मैं आश्रम शनिवार को जाता हूँ। आमतौर पर आवाजाही का ज़रिया पब्लिक ट्रांसपोर्ट ही होता है।  पिछले शनिवार मैंने ऑटो-रिक्शा का इस्तेमाल किया। चालक एक महिला थी, जानी-पहचानी सी लग रही थी।  आख़िरकार मैनें उस से पूछा, "मुझे लगता है मैंने आपको कहीं देखा है। क्या आप पहले अपने पति के साथ सैक्टर ३१ की मार्केट में चाय बेचने का कारोबार करते थे? आपको शायद याद नहीं मैंने कई दफ़ा आप की दुकान से चाय पी है।"  महिला चालक कुछ चौंकी, बोली, "हाँ साहब जी। पति की मौत के बाद अब मैं ऑटो चलाती हूँ।" उसने भारी मन से जवाब दिया  "ओह! यह सुनकर बहुत दुख हुआ। क्या आपने दूसरी शादी कर ली है?" मैंने पूछा  "नहीं साहब जी। मैंने दूसरी शादी नहीं की है, अब करेगा भी कौन।"  "तो फिर आपने सिंदूर और मंगलसूत्र क्यों पहन रखा है?"  साहब जी, ऐसे दरिंदों की इस मुल्क़ में कमी नहीं है जो मेरे जैसी असहाय, बेवाओं को निगलने के लिए हरदम तैयार रहते हैं। "जंगली जानवरों" के हमले से बचने के लिए मैं एक खुशहाल शादीशुदा महिला का स्वांग रचती हूँ, सुहागिन की तरह श्रंगार करती हूँ।" ...

शाम की सैर

 शाम की सैर मेरे लिए अहम है।   ख़ुद से रूबरू होने के लिए, क़ुदरत को निहारने के लिए, अपने दोस्तों से मिलने जुलने के लिए।  मुख़्तलिफ़ क़िस्म के लोग रास्ते में मिलते हैं, बेसब्री से मेरा इंतज़ार करते हैं।  इन सभी के दिलों में मेरे लिए बेहद ख़ुलुस है। परमात्मा का शुक्रगुज़ार हूँ।  रघुराम सड़क किनारे साईकिल रिपेयर का काम करता है। मेरा हम-उम्र है। मेरी साईकिल की सर्विस, मरम्मत बखूबी करता है।  शाम को सबसे पहले रघु से ही मिलना होता है, राम राम होती है।  कुछ दूर जाने पर मंदिर के पुजारी के दर्शन होते हैं, हर बार चाय के लिए आग्रह करते हैं।  "पंडित जी, हमारे साथ चाय पीने के बाद सैर के लिए चले जाना। चुस्ती फुर्ती रहेगी।"  कभी मूड होता है तो बिस्किट या समोसे ले जाता हूँ। पुजारियों के साथ मंदिर के प्रांगण में चाय की चुस्कियों के साथ शास्त्रों, उपनिषदों पर विचार विमर्श होता है।  गंगा राम सड़क किनारे हेलमेट बेचने का काम करता है। मुझे देख कर हमेशा सैल्यूट करता है। कई बार मना करता हूँ, कहता हूँ कि मैं कोई फौजी नहीं हूँ।  "पर साहब आपके रंग ढंग तो ...

दो किस्म के लोग

  ये जहाँ सिर्फ़ दो ही किस्म के लोग को रास आता है - मूर्खों और शातिरों को।  मूर्खों को तो दीन दुनिया की कुछ भी ख़बर नहीं होती इसलिए वे अपनी ही मौज में रहते हैं, दुनिया के कायदे कानूनों से नावाक़िफ़।  और शातिर जो भी चाहते हैं, अमूमन हासिल कर ही लेते हैं - धोखे से या फिर रसूख़दारों की खुशामद करके।  हैरत की बात यह है कि दो ही तरह के लोग हरदम दुखी रहते हैं, इस संसार में अनुपयुक्त हैं - बुद्धिजीवी और भावनात्मक।  यह दुनिया दुखों, तकलीफ़ों से भरी पड़ी है। नरम दिल इन दुखों का तहेदिल से ख़ात्मा करना चाहता है, दीन दुखियों को सुकून देना चाहता है।  पर विडम्बना यह है कि उसके पास ज़रूरी साधन नहीं होते। पैसा और ताकत सिर्फ़ संगदिलों को ही मयस्सर है। इसलिए वह दुखी रहता है।  मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने बिल्कुल सही कहा है, "बुद्धिमान लोगों को खुशी मिलना सबसे दुर्लभ चीज़ है। असल बात तो यह है कि यह दुनिया उनके लिए बनी ही नहीं है।"  दानिशवर बहुत जल्द इस दुनिया की असलियत को देख, समझ लेते हैं।  उन्हें इल्म हो जाता है कि यहाँ सब कुछ चलायमान है। सब कु...

कामयाबी के कारण

 कामयाबी केवल मशक़्क़त और हुनर ​​से ही हासिल नहीं होती। इसके पीछे कई दफ़ा और ही वज़ह होती है।  अपनी ज़िंदगी में मैंने बेशुमार ना-काब़िल लोगों को दुनियावी ऐशोआराम से लबरेज़ और काब़िलों को सड़कों की गर्द फांकते देखा है।  ठीक इसी तरह, महज़ अच्छी क्वालिटी से ही कोई प्रोडक्ट लोकप्रिय नहीं बन जाता।  कई बार तो क्वालिटी कुछ भी मायने नहीं रखती।  अंग्रेज़ी अख़बार "हिंदुस्तान टाइम्स" ने लगभग चालीस साल पहले मोहाली में अपना काम शुरू किया था।  मार्केट शेयर में इज़ाफ़ा करने और ट्राईसिटी (चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला) के दूसरे अख़बारों से मुकाबला करने के लिए ऑर्गनाइज़ेशन ने "रीडर्स रिलेशनशिप एग्जीक्यूटिव्स" की भर्ती शुरू की थी।  मैंने भी उस शॉर्ट-टर्म जॉब के लिए अप्लाई किया था, सिलेक्शन हो गया।  एक "रीडर्स रिलेशनशिप एग्जीक्यूटिव" के तौर पर मेरा काम अख़बार की ख़ासियतों को असरदार तरीके से बताना था - किफ़ायती कीमत, स्थानीय और राजनीतिक खबरों आदि।  जल्द ही हमारी टीम को एहसास हुआ कि ज़्यादातर लोग चंडीगढ़ से छपने वाले सबसे पुराने और मशहूर अखबार को ही पसंद करते हैं।...

कर्मों का खेल

 कल आश्रम में एक नौजवान ने बहुत वाजिब सवाल किया, "सर, क्या वजह है कि नेक इंसानों को मुश्किलातों से रू-ब-रु होना पड़ता है जबकि बदकार हर किस्म का लुत्फ़ ले रहे है।"  नौजवान का सवाल सुन कर मुझे मेरा गुज़रा वक़्त याद आ गया।  यही सवाल पहली दफ़ा मेरे ज़हन मे तब आया था जब मैं पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से इकोनॉमिक्स में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रहा था।  इस एक सवाल ने मुझे बेहद परेशाँ किया।  जवाब की खोज ने बेशुमार भटकाया।  क्योंकि मैं डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का पदाधिकारी था, इसलिए अक़्सर धार्मिक संस्थानों के प्रोग्रामों में जाना लगा रहता था।  इस वजह से साधु-संतों के साथ मेरा काफ़ी मेल-जोल था।  सवाल के जवाब की जुस्तुजू मुझे रामकृष्ण मिशन ले गई।  स्वामी रामानंद जी उस वक़्त संस्था के प्रमुख थे, अच्छी जान पहचान थी।  संन्यास लेने से पूर्व वह एक नामचीन न्यूरो-सर्जन थे, अमेरिका से तमाम तालीम हासिल की थी।  जब मैंने अपना सवाल स्वामी जी के सामने रखा तो उन्होंने मुस्कुरा कर कहा था, "बेटा, वाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण जी ने भी श्र...

आजकल के दौर की बड़ी समस्या

 आजकल के दौर में सबसे बड़ी समस्या वैवाहिक संबंधों को लेकर है। तकरीबन अस्सी फीसदी विवाहों की मियाद महज़ एक साल ही है, पंद्रह फीसदी तीन साल से ज्यादा नहीं टिक पाते।  कारण : (क) विवाह के बाद भी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखना, धोखा देना (ख) एक दूसरे से जरूरत से ज्यादा अपेक्षा रखना (ग) पति पत्नी में गहन मित्रता ना होना  हो सकता है कि शादी से पहले मेरे जीवन में लड़कियों का आना जाना हो पर शादी के बाद मेरी जिंदगी और ज़ेहन में सिर्फ मेरी जीवन संगिनी ही रही।  एक प्रतिष्ठित भारतीय वायु सेना अधिकारी की इकलौती बेटी होने के नाते मेरी पत्नी के माता-पिता उसे बहुत प्यार करते थे और उसके साथ राजकुमारी जैसा बर्ताव करते थे।  हालाँकि उसके माता-पिता का शादी के कुछ साल बाद ही इंतक़ाल हो गया था फिर भी वह उन्हें बहुत ज़्यादा याद करती थी।  एक दफ़ा शाम की सैर के वक़्त मेरी पत्नी ने एक अनोखी गुज़ारिश की, "संजय, आज मैं वायु सेना अधिकारियों के आवासीय परिसर में जाना चाहती हूँ। चलो वहाँ अंदर टहलते हैं।" उसकी ज़िद देखकर मुझे हैरानगी हुई।  अपने एक अधिकारी दोस्त की मदद से मैं उसे कड़ी सुरक्ष...

इंसानी जिस्म का महत्व

 "हालांकि इंसानी जिस्म दुनिया की सबसे गंदी और बेकार चीज़ है फिर भी हमारे शास्त्र इसी की तारीफ करते है।  इंसान और ज़्यादातर प्राणियों के जिस्म में दाख़िल होने के नौ रास्ते है जिन्हें 'नवद्वार' भी कहा जाता है - दो आँखें, दो कान, दो नथुने, मुँह, गुदा और जननांग। इन सभी नौ छिद्रों से केवल गंदे तरल पदार्थ ही बाहर निकलते है।  असल में यह शरीर मल और मूत्र से भरी एक थैली के अलावा और कुछ नहीं है।"  "लेकिन सर, आप यह कैसे कह सकते हैं कि मानव शरीर सबसे बेकार चीज़ है।" एक दाढ़ी वाले अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने पूछा  "सर, मानव शरीर सबसे बेकार चीज़ इसलिए है क्योंकि मरने के बाद भी दूसरे जानवरों के शरीरों से पैसे कमाए जा सकते हैं। इनका इस्तेमाल कई तरीकों से किया जा सकता है, जैसे चमड़े के कपड़े, जूते और वाद्य यंत्र बनाने में।  लेकिन मानव शरीर ही अकेला ऐसा शरीर है जो मरने के बाद पूरी तरह से बेकार हो जाता है। और तो और, इसके दाह संस्कार या दफनाने पर पैसे भी खर्च करने पड़ते है।" मैंने जवाब दिया  "लेकिन सर, इन सबके बावजूद हमारे शास्त्रों में इसे बेशकीमती क्यों बताया गया ...

आध्यात्मिक मार्ग पर लाज़मी चीज़ें

 "आध्यात्मिक मार्ग आसान नहीं है। साथ ही, यह हर किसी के लिए भी नही है।  आज के ज़माने में ऐसे बेशुमार लोग मिल जाएँगे जो खुद को परमात्मा, परमात्मा का नुमाइंदा होने का दावा करते हैं। पर ये ज़्यादातर ढ़ोंगी हैं।  मेरा पुख़्ता यकीन है कि इस जन्म और पिछले जन्मों के संस्कारों और प्रवृत्तियों के कारण ही कोई शख़्स असल में आध्यात्मिकता की ओर खिंचता है।  ऐसा शख़्स परमात्मा के लिए गहरी तड़प महसूस करता है। वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों की सलाह के बावजूद अपनी दौलत और परिवार को त्याग देता है।  राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) ने सत्य की खोज में अपना राज-पाट, परिवार और ऐशो-आराम की ज़िंदगी त्याग दी थी।  मेरे गुरु स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती जी संन्यास लेने से पहले "नेशनल हेराल्ड" अखबार में बेख़ौफ़, मशहूर पत्रकार थे। वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रूप से शामिल थे। लेकिन महज़ पच्चीस साल की उम्र में उन्होंने सब कुछ त्याग दिया और हिमालय में स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी से दीक्षा ली।  कई अमीर लोगों, उच्च अधिकारियों ने साधु या योगी बनने के लिए अपने सुख, दुनियावी ओहदों क...

सबसे बड़ा ख़ौफ़

 "सर, मौत का डर सबसे बड़ा डर है, हर किसी को सताता है। क्या इस से छुटकारा पाया जा सकता है?" एक बुज़ुर्ग ने सवाल किया  "आप सही कहते हो। मौत का ख़ौफ़ बेहद बड़ा ख़ौफ़ बन गया है। इसी की वज़ह से कई मुख़्तलिफ़ ख़ौफ़ पैदा होते है। इनसे निजात पाने के लिए हम लोगों से जुड़ते है, रिश्ते बनाते है, धन-दौलत का आडंबर लगाते है। हमें यह गलत-फ़हमी हो जाती है कि हमारी दौलत, रूतबा, मरासिम इन सब ख़ौफ़ों का ख़ात्मा कर देंगे। पर बावजूद इनके बेचैनी, दहशत क़ायम रहती है।  "सर, मौत का खेल तो पैदा होते ही शुरू हो जाता है। पुरानी कोशिकाएं मरती है, नई जगह लेती है। बचपन मरता है जवानी आती है। जवानी तबाह होती है बुढ़ापे की ख़ातिर। बुढा़पे के बाद जिस्म की मौत होती है। मौत के बाद फिर पैदाइश। जीवन-चक्र चलता रहता है, बेअंत है। मौत असल में बदलाव को ही कहा जाता है। अगर बदलाव नही होगा, तरक्की भी नही होगी। कैटरपिलर मरेगा तो ही तितली बनेगा। बीज मरेगा तो ही आसमान छूता शजर बनेगा।" मैंने कहा  "तो हमें मौत से नहीं डरना चाहिए।"  "हमें इस बात का ख़ौफ़ होना चाहिए कि हम फिर से किसी माँ के पेट में...

चैन ढूंढते रहे हम उम्र भर

  चैन ढूँढते रहे हम उम्र-भर फ़रेब ही मिला हमे दर-ब-दर देख कर आईना हुआ ये एहसास अक्स भी है आज मुझसे बे-ख़बर  ज़ख्म गहरे थे, नुमायाँ ना हो सके दर्द सहने का भी आ गया है हुनर  उम्र बीत गई यही सोच सोच कर  क्या मिलेगी कभी सुकून की लहर  चैन ढूँढते रहे हम उम्र-भर फ़रेब ही मिला हमे दर-ब-दर...  फ़रेब : धोखा   दर-ब-दर : जगह जगह अक्स : परछाईं   नुमायाँ : ज़ाहिर  ~ संजय गार्गीश ~   

प्राथना और पूजा में फ़र्क़

 "अंग्रेज़ी ज़बान में इबादत के लिए एक ही लफ्ज़ है - प्रेयर करना।  पर हिंदूस्तानी बोली में इबादत के लिए मुख़्तलिफ़ लफ्ज़ है। आमतौर पर प्राथना, पूजा का इस्तेमाल किया जाता है।"  "सर, क्या प्राथना और पूजा में कुछ फ़र्क़ है?" एक साधिका ने मुझ से कुछ दिनों पहले पूछा  "प्राथना मक़सद के लिए की जाती है। परमात्मा से नौकरी के लिए, बच्चों की सलामती के लिए, धन-दौलत इत्यादि के लिए गुहार लगाना ही प्राथना है।  लेकिन पूजा का मुख्य उद्देश्य होता है शुक्रिया करना, परम पिता को थैंक्स करना कि जो कुछ भी उन्होंने दिया है, वह लाखों करोड़ों लोगों की पहुॅंच से बहुत बाहर है।" मैंने जवाब दिया  "तो सर हमें प्राथना करनी चाहिए या पूजा?"  "बेशक पूजा।"  "पर क्यों? हम अपने पिता से मांग सकते है तो परम पिता से मांगने में क्या हर्ज है?"  "आप के पिता इंसान है, आप की दिली ख़्वाहिशें नही जान सकते, ज़ाहिर करनी पड़ती है। उन्हें यह भी इल्म नही है कि आप की ख़्वाहिश पूरी करना सही है या नहीं। यह भी मुमकिन है कि आप की जायज़ ख़्वाहिशें पूरी करना उन के बस में ना हो। अगर आ...

वक़्त बदल गया है...

 वक़्त बदल गया है, मुद्दे बदल गए है, मक़सद बदल गए है।  जवानी के दौर में मैं अच्छी खासी जॉगिंग, स्प्रिंट और पुश-अप्स लगाता था।  उद्देश्य एक ही था - ख़ूबसूरत लड़कियों को प्रभावित करना, पटाना।  कुछ दिनों पहले मैंने कुछ जवान लड़कों और लड़कियों को जॉगिंग करते देखा।  उन्होंने अपने मोबाइल फोनों को अपनी बांहों पर  बांधा था।  मेरे पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि उन्होंने ऐप डाउनलोड किया है जो उनके कदमों का हिसाब किताब रखता है।  दस हज़ार से ज़्यादा कदम चलने पर उन्हें चीज़ों पर भारी छूट मिलती है।  जॉगिंग और डिस्काउंट अब दोनों साथ-साथ चलते है।  अक़्सर मै एक बुज़ुर्ग दंपत्ति को पार्क में दोपहर में टहलते देखता हूँ।  कल दोपहर को मैं किसी काम से पार्क से गुज़र रहा था, उसी बुज़ुर्ग दंपत्ति को बेंच पर बैठा देखा।  "अंकल जी, मैं अक़्सर आपको दोपहर में टहलते हुए देखता हूँ। आज आप बैठे है। तबीयत तो ठीक है ना?"  "हाँ बेटा, सब कुछ दुरुस्त है।" बुज़ुर्ग ने जवाब दिया  "वैसे अंकल जी अब गर्मी हो गई है। टहलने के लिए सुबह का समय अच्छा होता है।" मैंने...

क्या वक़्त वाकई क़ीमती है?

 पिछले हफ़्ते आश्रम में एक ख़ूबसूरत नौजवान से मुलाक़ात हुई। गुफ्तगू के दौरान मालूम हुआ कि उसने एक नामचीन इंस्टीट्यूट से मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की तालीम ली है।  "सर, अक़्सर मुझे लगता है कि मेडिटेशन से मैं वक़्त बर्बाद कर रहा हूँ। कुछ भी ना सोचना, कुछ भी ना करना, कुछ भी ना कहना, सर क्या यह व्यर्थ में वक़्त गंवाना नही है? सर, वक़्त मूल्यवान है!" नौजवान ने मुझसे सवाल किया  "बेटा, आप कहते हो कि वक़्त क़ीमती है। क्या आप क़ीमती वस्तु की परिभाषा बता सकते हो?" मैंने पूछा  "सर, इकोनॉमिक्स के मुताबिक़ जो चीज़ कम होती है, वो मूल्यवान होती है।  "बेटा आपने बजा फरमाया। अमूमन कमी ही कीमत तय करती है। पर क्या समय कम होता है, निश्चित होता है?" मैंने पूछा "सर, हमारे को यही पढ़ाया गया है।"  "बेटा, क्योंकि हमारे एजुकेशन सिस्टम पर अंग्रेज़ों का प्रभाव है इसलिए आपको ऐसा पढ़ाया गया है। "वक़्त मूल्यवान है", यह एक अंग्रेज़ी कहावत है।" "मैं कुछ समझा नही सर। कृपया खुल कर बताएं।" नौजवान ने उत्सुकता से कहा  "बेटा, पश्चिम में, ईस...

वेलेंटाइन डे पर नौजवानों को संदेश

 अपनी मोहब्बत का इज़हार करना आसान है।  पर मोहब्बत को बरक़रार  रखना मुश्किल है, बेहद मुश्किल।  यही वज़ह है कि मौजूदा वक़्त में बड़ी तादाद में तलाक़ हो रहें है।  मै मोहब्बत के मामलों का माहिर तो नहीं हूँ पर अपने कुछ तजुर्बे वेलेंटाइन डे के मौके पर नौजवानों के साथ शेयर करना चाहता हूँ।  आमतौर पर "बेहद नज़दीकियाँ" ही मोहब्बत का मतलब समझा जाता है - एक दूसरे की क़ुर्बत में खो जाना।  लेकिन मेरा तजुर्बा कहता है कि ज़्यादा करीबियां घुटन का एहसास लाती हैं, नुक़सान-देह होती है।  मोहब्बत को पुख़्ता रखने के लिए कभी कभार दूरियाँ भी ज़रुरी है।  मोहब्बत का मतलब अपनी ख़्वाहिशों को एक दूसरे पर थोपना हरगिज़ नहीं है।  मोहब्बत का मतलब है एक दूसरे को उसकी ख़ूबियों और दोषों के साथ क़बूल करना।  मेरा मानना है कि मोहब्बत में इज़ाफ़ा "क़ैद" से नहीं, "आज़ादी" से ही मुमकिन है।  एक दूसरे को आज़ादी देने से ही मोहब्बत में मजबूती आती है।  सबसे अहम है इस बात का इल्म होना कि जिस्मानी प्यार आरज़ी होता है, क्षणिक होता है।  अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो ...

कभी गुल-ए-बहार...

 कभी गुल-ए-बहार  कभी ख़ार ही ख़ार  कभी अज़ाब बेशुमार  कभी बेवज़ह करार  कभी आँसूओं की धार  कभी नेमतें हज़ार  कभी तपिश-ए-रेगज़ार  कभी बसंत की बयार नहीं कोई पाया पार  यही ज़िंदगी का सार  यही ज़िंदगी का सार  गुल-ए-बहार : बसंत का गुलाब,  ख़ार : काँटे, अज़ाब : दुख, करार : चैन  तपिश-ए-रेगज़ार : रेगिस्तान की गर्मी,  बयार : हवा  ~ संजय गार्गीश ~ 

एक गुज़ारिश

 इस बात से ब-ख़ूबी है ख़बर  मुश्किल है मेरी हर राहगुज़र  उतर गया है दिल से दहर क़फ़स बन गया ये शहर एक गुज़ारिश है तुम से मगर  हो जाओ मेरे हमसफर अगर  दर्द-ओ-अलम मेरे जाऐंगे ठहर  राहें रोशन होंगी हर पहर  दहर : दुनिया क़फ़स : क़ैद-ख़ाना दर्द-ओ-अलम : दुख और तकलीफ़ें ~ संजय गार्गीश ~