दो किस्म के लोग

 


ये जहाँ सिर्फ़ दो ही किस्म के लोग को रास आता है - मूर्खों और शातिरों को। 

मूर्खों को तो दीन दुनिया की कुछ भी ख़बर नहीं होती इसलिए वे अपनी ही मौज में रहते हैं, दुनिया के कायदे कानूनों से नावाक़िफ़। 

और शातिर जो भी चाहते हैं, अमूमन हासिल कर ही लेते हैं - धोखे से या फिर रसूख़दारों की खुशामद करके। 

हैरत की बात यह है कि दो ही तरह के लोग हरदम दुखी रहते हैं, इस संसार में अनुपयुक्त हैं - बुद्धिजीवी और भावनात्मक। 

यह दुनिया दुखों, तकलीफ़ों से भरी पड़ी है। नरम दिल इन दुखों का तहेदिल से ख़ात्मा करना चाहता है, दीन दुखियों को सुकून देना चाहता है। 

पर विडम्बना यह है कि उसके पास ज़रूरी साधन नहीं होते। पैसा और ताकत सिर्फ़ संगदिलों को ही मयस्सर है। इसलिए वह दुखी रहता है। 

मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने बिल्कुल सही कहा है, "बुद्धिमान लोगों को खुशी मिलना सबसे दुर्लभ चीज़ है। असल बात तो यह है कि यह दुनिया उनके लिए बनी ही नहीं है।" 

दानिशवर बहुत जल्द इस दुनिया की असलियत को देख, समझ लेते हैं। 

उन्हें इल्म हो जाता है कि यहाँ सब कुछ चलायमान है। सब कुछ एक रोज़ छूट ही जाना है - हर शख़्स, हर शय। 

ऐसे में वे भला खुश कैसे रह सकते हैं। 

मैंने देखा है कि अमूमन लेखक, कवि अकेले रहना ज़्यादा पसंद करते हैं। 

वे लोगों से ज़्यादा घुलते-मिलते नहीं क्योंकि : 

(क) आम लोगों के लिए उन्हें समझना बेहद मुश्किल है। भला एक छोटी सी पानी की बूँद विशाल समंदर को कैसे समझ सकती है। 

(ख) दानिशवर इस बात को बखूबी जानते हैं कि यहाँ ज़्यादातर लोग बस दिखावा कर रहे हैं। और उन्हें ऐसे बनावटी, बेमतलब का नाटक करने वाले लोग बिल्कुल भी पसंद नहीं आते। 

वे अच्छी तरह जानते हैं कि इस "जेल-रूपी दुनिया" में वे कफ़स में कैद परिंदे की तरह हैं। 

वे यहाँ से भाग जाना चाहते हैं - इस सारी बकवास से दूर, यहाँ तक कि खुद से भी दूर भाग जाना चाहते हैं। 

वे हर पल तिल-तिल कर मर रहे हैं। 

यक़ीनन जिसे ईश्वर सज़ा देना चाहते हैं उसे ही इस धरती पर बुद्धिजीवी बनाकर भेज देते हैं। 


~ संजय गार्गीश ~ 


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