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कामयाबी के कारण

 कामयाबी केवल मशक़्क़त और हुनर ​​से ही हासिल नहीं होती। इसके पीछे कई दफ़ा और ही वज़ह होती है।  अपनी ज़िंदगी में मैंने बेशुमार ना-काब़िल लोगों को दुनियावी ऐशोआराम से लबरेज़ और काब़िलों को सड़कों की गर्द फांकते देखा है।  ठीक इसी तरह, महज़ अच्छी क्वालिटी से ही कोई प्रोडक्ट लोकप्रिय नहीं बन जाता।  कई बार तो क्वालिटी कुछ भी मायने नहीं रखती।  अंग्रेज़ी अख़बार "हिंदुस्तान टाइम्स" ने लगभग चालीस साल पहले मोहाली में अपना काम शुरू किया था।  मार्केट शेयर में इज़ाफ़ा करने और ट्राईसिटी (चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला) के दूसरे अख़बारों से मुकाबला करने के लिए ऑर्गनाइज़ेशन ने "रीडर्स रिलेशनशिप एग्जीक्यूटिव्स" की भर्ती शुरू की थी।  मैंने भी उस शॉर्ट-टर्म जॉब के लिए अप्लाई किया था, सिलेक्शन हो गया।  एक "रीडर्स रिलेशनशिप एग्जीक्यूटिव" के तौर पर मेरा काम अख़बार की ख़ासियतों को असरदार तरीके से बताना था - किफ़ायती कीमत, स्थानीय और राजनीतिक खबरों आदि।  जल्द ही हमारी टीम को एहसास हुआ कि ज़्यादातर लोग चंडीगढ़ से छपने वाले सबसे पुराने और मशहूर अखबार को ही पसंद करते हैं।...

कर्मों का खेल

 कल आश्रम में एक नौजवान ने बहुत वाजिब सवाल किया, "सर, क्या वजह है कि नेक इंसानों को मुश्किलातों से रू-ब-रु होना पड़ता है जबकि बदकार हर किस्म का लुत्फ़ ले रहे है।"  नौजवान का सवाल सुन कर मुझे मेरा गुज़रा वक़्त याद आ गया।  यही सवाल पहली दफ़ा मेरे ज़हन मे तब आया था जब मैं पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से इकोनॉमिक्स में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रहा था।  इस एक सवाल ने मुझे बेहद परेशाँ किया।  जवाब की खोज ने बेशुमार भटकाया।  क्योंकि मैं डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का पदाधिकारी था, इसलिए अक़्सर धार्मिक संस्थानों के प्रोग्रामों में जाना लगा रहता था।  इस वजह से साधु-संतों के साथ मेरा काफ़ी मेल-जोल था।  सवाल के जवाब की जुस्तुजू मुझे रामकृष्ण मिशन ले गई।  स्वामी रामानंद जी उस वक़्त संस्था के प्रमुख थे, अच्छी जान पहचान थी।  संन्यास लेने से पूर्व वह एक नामचीन न्यूरो-सर्जन थे, अमेरिका से तमाम तालीम हासिल की थी।  जब मैंने अपना सवाल स्वामी जी के सामने रखा तो उन्होंने मुस्कुरा कर कहा था, "बेटा, वाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण जी ने भी श्र...

आजकल के दौर की बड़ी समस्या

 आजकल के दौर में सबसे बड़ी समस्या वैवाहिक संबंधों को लेकर है। तकरीबन अस्सी फीसदी विवाहों की मियाद महज़ एक साल ही है, पंद्रह फीसदी तीन साल से ज्यादा नहीं टिक पाते।  कारण : (क) विवाह के बाद भी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखना, धोखा देना (ख) एक दूसरे से जरूरत से ज्यादा अपेक्षा रखना (ग) पति पत्नी में गहन मित्रता ना होना  हो सकता है कि शादी से पहले मेरे जीवन में लड़कियों का आना जाना हो पर शादी के बाद मेरी जिंदगी और ज़ेहन में सिर्फ मेरी जीवन संगिनी ही रही।  एक प्रतिष्ठित भारतीय वायु सेना अधिकारी की इकलौती बेटी होने के नाते मेरी पत्नी के माता-पिता उसे बहुत प्यार करते थे और उसके साथ राजकुमारी जैसा बर्ताव करते थे।  हालाँकि उसके माता-पिता का शादी के कुछ साल बाद ही इंतक़ाल हो गया था फिर भी वह उन्हें बहुत ज़्यादा याद करती थी।  एक दफ़ा शाम की सैर के वक़्त मेरी पत्नी ने एक अनोखी गुज़ारिश की, "संजय, आज मैं वायु सेना अधिकारियों के आवासीय परिसर में जाना चाहती हूँ। चलो वहाँ अंदर टहलते हैं।" उसकी ज़िद देखकर मुझे हैरानगी हुई।  अपने एक अधिकारी दोस्त की मदद से मैं उसे कड़ी सुरक्ष...

इंसानी जिस्म का महत्व

 "हालांकि इंसानी जिस्म दुनिया की सबसे गंदी और बेकार चीज़ है फिर भी हमारे शास्त्र इसी की तारीफ करते है।  इंसान और ज़्यादातर प्राणियों के जिस्म में दाख़िल होने के नौ रास्ते है जिन्हें 'नवद्वार' भी कहा जाता है - दो आँखें, दो कान, दो नथुने, मुँह, गुदा और जननांग। इन सभी नौ छिद्रों से केवल गंदे तरल पदार्थ ही बाहर निकलते है।  असल में यह शरीर मल और मूत्र से भरी एक थैली के अलावा और कुछ नहीं है।"  "लेकिन सर, आप यह कैसे कह सकते हैं कि मानव शरीर सबसे बेकार चीज़ है।" एक दाढ़ी वाले अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने पूछा  "सर, मानव शरीर सबसे बेकार चीज़ इसलिए है क्योंकि मरने के बाद भी दूसरे जानवरों के शरीरों से पैसे कमाए जा सकते हैं। इनका इस्तेमाल कई तरीकों से किया जा सकता है, जैसे चमड़े के कपड़े, जूते और वाद्य यंत्र बनाने में।  लेकिन मानव शरीर ही अकेला ऐसा शरीर है जो मरने के बाद पूरी तरह से बेकार हो जाता है। और तो और, इसके दाह संस्कार या दफनाने पर पैसे भी खर्च करने पड़ते है।" मैंने जवाब दिया  "लेकिन सर, इन सबके बावजूद हमारे शास्त्रों में इसे बेशकीमती क्यों बताया गया ...

आध्यात्मिक मार्ग पर लाज़मी चीज़ें

 "आध्यात्मिक मार्ग आसान नहीं है। साथ ही, यह हर किसी के लिए भी नही है।  आज के ज़माने में ऐसे बेशुमार लोग मिल जाएँगे जो खुद को परमात्मा, परमात्मा का नुमाइंदा होने का दावा करते हैं। पर ये ज़्यादातर ढ़ोंगी हैं।  मेरा पुख़्ता यकीन है कि इस जन्म और पिछले जन्मों के संस्कारों और प्रवृत्तियों के कारण ही कोई शख़्स असल में आध्यात्मिकता की ओर खिंचता है।  ऐसा शख़्स परमात्मा के लिए गहरी तड़प महसूस करता है। वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों की सलाह के बावजूद अपनी दौलत और परिवार को त्याग देता है।  राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) ने सत्य की खोज में अपना राज-पाट, परिवार और ऐशो-आराम की ज़िंदगी त्याग दी थी।  मेरे गुरु स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती जी संन्यास लेने से पहले "नेशनल हेराल्ड" अखबार में बेख़ौफ़, मशहूर पत्रकार थे। वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रूप से शामिल थे। लेकिन महज़ पच्चीस साल की उम्र में उन्होंने सब कुछ त्याग दिया और हिमालय में स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी से दीक्षा ली।  कई अमीर लोगों, उच्च अधिकारियों ने साधु या योगी बनने के लिए अपने सुख, दुनियावी ओहदों क...

सबसे बड़ा ख़ौफ़

 "सर, मौत का डर सबसे बड़ा डर है, हर किसी को सताता है। क्या इस से छुटकारा पाया जा सकता है?" एक बुज़ुर्ग ने सवाल किया  "आप सही कहते हो। मौत का ख़ौफ़ बेहद बड़ा ख़ौफ़ बन गया है। इसी की वज़ह से कई मुख़्तलिफ़ ख़ौफ़ पैदा होते है। इनसे निजात पाने के लिए हम लोगों से जुड़ते है, रिश्ते बनाते है, धन-दौलत का आडंबर लगाते है। हमें यह गलत-फ़हमी हो जाती है कि हमारी दौलत, रूतबा, मरासिम इन सब ख़ौफ़ों का ख़ात्मा कर देंगे। पर बावजूद इनके बेचैनी, दहशत क़ायम रहती है।  "सर, मौत का खेल तो पैदा होते ही शुरू हो जाता है। पुरानी कोशिकाएं मरती है, नई जगह लेती है। बचपन मरता है जवानी आती है। जवानी तबाह होती है बुढ़ापे की ख़ातिर। बुढा़पे के बाद जिस्म की मौत होती है। मौत के बाद फिर पैदाइश। जीवन-चक्र चलता रहता है, बेअंत है। मौत असल में बदलाव को ही कहा जाता है। अगर बदलाव नही होगा, तरक्की भी नही होगी। कैटरपिलर मरेगा तो ही तितली बनेगा। बीज मरेगा तो ही आसमान छूता शजर बनेगा।" मैंने कहा  "तो हमें मौत से नहीं डरना चाहिए।"  "हमें इस बात का ख़ौफ़ होना चाहिए कि हम फिर से किसी माँ के पेट में...

चैन ढूंढते रहे हम उम्र भर

  चैन ढूँढते रहे हम उम्र-भर फ़रेब ही मिला हमे दर-ब-दर देख कर आईना हुआ ये एहसास अक्स भी है आज मुझसे बे-ख़बर  ज़ख्म गहरे थे, नुमायाँ ना हो सके दर्द सहने का भी आ गया है हुनर  उम्र बीत गई यही सोच सोच कर  क्या मिलेगी कभी सुकून की लहर  चैन ढूँढते रहे हम उम्र-भर फ़रेब ही मिला हमे दर-ब-दर...  फ़रेब : धोखा   दर-ब-दर : जगह जगह अक्स : परछाईं   नुमायाँ : ज़ाहिर  ~ संजय गार्गीश ~