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वेलेंटाइन डे पर नौजवानों को संदेश

 अपनी मोहब्बत का इज़हार करना आसान है।  पर मोहब्बत को बरक़रार  रखना मुश्किल है, बेहद मुश्किल।  यही वज़ह है कि मौजूदा वक़्त में बड़ी तादाद में तलाक़ हो रहें है।  मै मोहब्बत के मामलों का माहिर तो नहीं हूँ पर अपने कुछ तजुर्बे वेलेंटाइन डे के मौके पर नौजवानों के साथ शेयर करना चाहता हूँ।  आमतौर पर "बेहद नज़दीकियाँ" ही मोहब्बत का मतलब समझा जाता है - एक दूसरे की क़ुर्बत में खो जाना।  लेकिन मेरा तजुर्बा कहता है कि ज़्यादा करीबियां घुटन का एहसास लाती हैं, नुक़सान-देह होती है।  मोहब्बत को पुख़्ता रखने के लिए कभी कभार दूरियाँ भी ज़रुरी है।  मोहब्बत का मतलब अपनी ख़्वाहिशों को एक दूसरे पर थोपना हरगिज़ नहीं है।  मोहब्बत का मतलब है एक दूसरे को उसकी ख़ूबियों और दोषों के साथ क़बूल करना।  मेरा मानना है कि मोहब्बत में इज़ाफ़ा "क़ैद" से नहीं, "आज़ादी" से ही मुमकिन है।  एक दूसरे को आज़ादी देने से ही मोहब्बत में मजबूती आती है।  सबसे अहम है इस बात का इल्म होना कि जिस्मानी प्यार आरज़ी होता है, क्षणिक होता है।  अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो ...

कभी गुल-ए-बहार...

 कभी गुल-ए-बहार  कभी ख़ार ही ख़ार  कभी अज़ाब बेशुमार  कभी बेवज़ह करार  कभी आँसूओं की धार  कभी नेमतें हज़ार  कभी तपिश-ए-रेगज़ार  कभी बसंत की बयार नहीं कोई पाया पार  यही ज़िंदगी का सार  यही ज़िंदगी का सार  गुल-ए-बहार : बसंत का गुलाब,  ख़ार : काँटे, अज़ाब : दुख, करार : चैन  तपिश-ए-रेगज़ार : रेगिस्तान की गर्मी,  बयार : हवा  ~ संजय गार्गीश ~ 

एक गुज़ारिश

 इस बात से ब-ख़ूबी है ख़बर  मुश्किल है मेरी हर राहगुज़र  उतर गया है दिल से दहर क़फ़स बन गया ये शहर एक गुज़ारिश है तुम से मगर  हो जाओ मेरे हमसफर अगर  दर्द-ओ-अलम मेरे जाऐंगे ठहर  राहें रोशन होंगी हर पहर  दहर : दुनिया क़फ़स : क़ैद-ख़ाना दर्द-ओ-अलम : दुख और तकलीफ़ें ~ संजय गार्गीश ~ 

तन्हाई से निजात

 उम्र के आखिरी पड़ाव में आमतौर पर दो कठिन समस्याएं देखने को मिलती है - तेजी से बढती महंगाई में सीमित आमदनी से अपने जिस्म और रूह को एकजुट रखना, अकेलेपन से ख़ुद को महफ़ूज़ रखना।  मेरे कई दोस्त, हम जमाती फाइनेंशियल एक्सपर्ट है। लोगों को फाइनेंशियल लिटरेसी, प्लानिंग के बारे में जानकारी देते है ताकि ज़िन्दगी की शाम में क़िल्लत ना आए।  माली समस्या का तो साफ हल है।  पर तन्हाई को जीतना नामुमकिन सा लगता है।  ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि जैसे जैसे इंसान बुज़ुर्ग होता जाता है, अकेलेपन के काले साए गहरे होते जाते है।  मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली साहब ने सही फरमाया है "जुबां मिली है मगर हम-जुबां नहीं मिलता"।  आज मुझे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बड़े ओहदे से, हाल ही में, रिटायर्ड हुए एक जानकार मिले।  "सर, कंपनी में जिन लोगों के साथ मैंने रोज़ दस-बारह घंटे बिताए, हंसी मजाक किया, दुख-सुख सांझा किया, रिटायरमेंट के बाद उन लोगों ने मेरी सुधबुध भी नही ली। और तो और, मेरे बच्चों के पास भी मेरे लिए वक़्त नही है। कोई भी सलाह देने की कोशिश करता हूँ तो कहते है कि आप तो पुराने ज़माने के ह...

संन्यास क्या है

 बेहद खुशी होती है जब देखता हूँ कि पढ़े लिखे नौजवान काॅरपोरेट सेक्टर के बड़े ओहदों को छोड़ कर अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रहे है, अपने वजूद को जानने की क़ोशिश कर रहे है।  कल आश्रम में ऐसे ही एक नौजवान ने सवाल किया, "सर, मैंने यह महसूस किया है कि हर साल दूसरे मुल्कों के बाशिंदे भारत मे संन्यास लेने के लिए बेशुमार तादाद मे आते है और उन लोगों की संन्यास के लिए ईमानदारी काब़िल-ए-तारीफ है, हम से कई गुना ज्यादा है। ऐसा क्यों?"  "बेटा, सच्चाई यह है कि यहाँ बहुत ही कम लोग है जो हकीकत मे अध्यात्मिक है। ज्यादातर फरेबी है, गरीब घरों से है। इन्हों के लिए अध्यात्म रोज़ी-रोटी है, अय्याशी का साधन है। इन्हों के ज़हन मे हरदम संसार ही रहता है, ये सिर्फ सांसारिक वस्तुओं का ही मनन करते है।" वास्तव मे संन्यास का मार्ग संसार से ही जाता है। बगैर संसार को समझे संन्यास लेना बेईमानी है।  अगर कोई सही मे संन्यासी होगा तो या तो वह अमीर और अक्लमंद होगा या सिर्फ अक्लमंद।  अमीर हो पर विवेकवान ना हो तो संन्यास नामुमकिन है।"  "वो कैसे सर?"  "इकोनॉमिक्स मे एक सिद्धांत है जिसे लागत-ल...

मंज़िल ए इश्क़

 मंज़िल ए इश्क़ का बहुत  पहले मिल जाना था  सिर्फ अपनी हस्ती को ही  तो हमें मिटाना था।  मेरा अक्स आईने में कोई मायने नहीं रखता  मेरे अक्स को जो देखे बस उसी को जानना था।  राहें आसॉं होती मयस्सर  होती हर शय बदले मौसमों में हमें भी  बदल जाना था।  ऐ नादान, लबों पर तबस्सुम  को सजाना था  फिर उन्हें अपने ग़म-ओ-अलम  सुनाना था।  अक्स : परछाई  मयस्सर : हासिल होना  शय : वस्तु  तबस्सुम : मुस्कान ग़म-ओ-अलम : दुःख और दर्द  ~ संजय गार्गीश ~

नई उम्मीद

  जब धूप यक़ीनी है तो  साया भी बेशक़ होगा  इसने भी इत्तिला नहीं दी  वो भी यकायक होगा।  बस उसके मंसूबों की  तामील हो रही है  जो तूने नहीं सोचा  वो भी बेशक़ होगा।  ऐ दोस्त मेरे कब तक  खुद को बचा पाओगे  तुम को भी प्यार होगा  वो भी अचानक होगा।  इत्तिला : सूचना  यकायक : एकाएक मंसूबा : योजना  तामील : पूरा करना  ~ संजय गार्गीश ~