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क्या महज़ नास्तिक होना गलत है, पाप है?

 "सर, मैं किसी भगवान को नहीं मानती, कोई तीर्थ यात्रा नहीं करती ना ही किसी धार्मिक किताब में मेरा यक़ी है। क्या मैं गलत हूँ?"  पिछले शनिवार आश्रम में एक महिला ने मुझसे यह सवाल किया।  सवाल अहम था।  क्या महज़ नास्तिक होना गलत है, पाप है?  बिल्कुल नहीं।  मैंने बेशुमार ऐसे ख़ुदा-परस्त भी देखे हैं जो ज़्यादातर वक़्त मंदिरों, मस्जिदों में गुज़ारते हैं, हर धार्मिक समागम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं पर दिल के बेहद मैले हैं।  मक्कारी बेइंतहा है, ईर्ष्या है, सिरे का लालच है, चुगलखोर हैं, दूसरों के लिए दिल में सिर्फ बेरहमी है।  मुझे याद है कुछ वक़्त पहले मैं पैदल रास्ते पर चल रहा था। अचानक पीछे से तेज़ रफ़्तार बाइक निकली, मैं ब-मुश्किल बचा।  गुस्से में मैंने बाइक सवार को ठेठ पंजाबी में "कर्णप्रिय" श्लोक सुनाए, रुकने को कहा।  बाइक सवार थोड़ी दूरी पर रूका। मैं उसके पास गया। देखा कि वह धार्मिक वेशभूषा में है।  "आपको शर्म आनी चाहिए। एक धर्म गुरु होने के नाते आप का कर्तव्य है कि आप क़ानून की पालना कर के मिसाल क़ायम करें। क्या आपको मालूम है कि इस त...

बुढ़ापे में आर्थिक स्वतंत्रता ज़रूरी है

 मेरे एक जानकार ने कई रोज़ पहले दर्दनाक किस्सा सुनाया।  दिल्ली में एक मकान से बदबू आ रही थी। पड़ोसियों ने पुलिस को इत्तिला दी। दरवाज़े को तोड़ा गया, पुलिस ने देखा कि उम्रदराज़ मकान मालिक का शव बिस्तर पर पड़ा था। मौत की वजह - हार्ट अटैक।  पड़ोसियों ने बताया कि कई मर्तबा वे ही बुज़ुर्ग को खाना, दवाइयाँ खरीद कर देते थे।  अलमारी खोलने पर एक डायरी मिली जिसमें उसके बेटे और बेटी का फोन नंबर था।  बेटा अमेरिका में बहुत बड़ा डाक्टर है। फोन करने पर उसने कहा, "इस लाश के लिए मैं क्या सारे काम छोड़कर आऊं। आप ने जो इस का करना है कर दिजिए।"  मुंबई में रह रही बेटी का जवाब था, "मैं शादीशुदा हूँ, दो बच्चे हैं। अपने हस्बैंड, बच्चों को देखना पड़ता है। सॉरी, मैं वक़्त नहीं निकाल सकती।"  क्या आप जानते हैं कि भारतीयों में सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी क्या है?  एक आम भारतीय अपने बच्चों की बेहतरीन परवरिश, तालीम, शादी पर बेइंतहा खर्च करता है। सोचता है कि ये सब लान्ग टर्म इन्वेस्टमेंट है, मुनासिब रिटर्न उसे बुढ़ापे में मिलेगा जब वह कमाने योग्य नहीं होगा।  बस यही सोच सबसे बड़ी भ्...

ये सारी क़ायनात वक़्त के इख़्तियार में है

 ये सारी क़ायनात वक़्त के इख़्तियार में है। वक़्त सब कुछ बदल देता है -  हालात, विचार।  मैंने १९८६ में दसवीं जमात पास की, सरकार ने १०+२ सिस्टम लागू कर दिया।  स्कूलों में १०+२ जमातों को पढ़ाने का बंदोबस्त नहीं था सो मैंने डीएवी कालेज, सैक्टर १०, चंडीगढ़ में दाखिला लेने की सोची।  इसी कॉलेज में पॉंच साल पढ़ा - दो साल १०+२, तीन साल बी ए आनर्स।  विषयों के बारे में इल्म नहीं था सो आर्ट्स के विषय फार्म में भर दिए।  उस वक़्त कॉलेज के प्रिंसिपल डा. किशन सिंह आर्य जी थे।  उन्होंने मुझे, एक और लड़के समीर पाल सिंह को अपने दफ़्तर में बुलाया।  "बेटा, आप के तो दसवीं में बहुत अच्छे नंबर हैं, आर्ट्स क्यों भरा? मैं आपको नॉन मेडिकल दे रहा हूँ।"  उसी वक़्त समीर पाल सिंह से मेरी पहली मुलाक़ात हुई जो बाद में पक्की दोस्ती में तब्दील हुई।  समीर द लॉरेंस स्कूल - सनावर, कसौली (हिमाचल प्रदेश) से दसवीं तक पढ़ा था। पिता जी के सिलीगुड़ी (वेस्ट बंगाल) में चाय के बागान थे। अमीर बाप का बेटा पर बेहद विनम्र।  +२ में मेरे नंबर बेहतरीन आए पर ना जाने क्यों साइंस विष...

कर्मों का हिसाब किताब

मेरे एक पुराने दोस्त ने मुझ से अपना दर्द सांझा किया, "शर्मा जी, मैं जिंदगी से बेहद तंग हूँ। दफ़्तर से घर जाने को ज़रा भी मन नहीं करता। अब दो-तीन साल बाद मेरी रिटायरमेंट है। सोच कर भी ख़ौफ़ लगता है कि फिर मै मुक्कमल वक़्त जहन्नुम जैसे घर में कैसे बिताऊंगा।"  "घर तो आदमी सुकूँ के पलों के लिए ही जाता है। पर आप को घर जहन्नुम क्यों लगता है। मैं कुछ समझा नहीं। खुल कर बताईये।"  "दोस्त, आप को तो पता है कि मेरे दो बच्चे हैं, बेटा और बेटी। बदक़िस्मती से दोनों ही मेरे इख़्तियार में नहीं है। बेटी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही है। बेटे ने तालीम मुकम्मल कर ली है। ना वह नौकरी करता है, ना कोई बिजनेस। दोनों के रईसी शौंक है - महंगे कपड़े, गाड़ियां, महंगे होटलों, शराब खानों में जाना। रात को बहुत लेट या फिर सुबह ही शराब के नशे में घुत हो कर घर वापस आते हैं। मेरी पत्नी इन दोनों की हरकतों की वजह से परेशान रहती है, बीमार रहती है।"  "पर आप इन्हों को पैसे क्यों देते हो।"  "अगर पैसे ना दूं तो झगड़ा करते हैं, गालियाँ देते हैं, घर छोड़ कर जाने की धमकी देते हैं। समाज में अपनी...

यह कैसी सुहागिन

अक़्सर मैं आश्रम शनिवार को जाता हूँ। आमतौर पर आवाजाही का ज़रिया पब्लिक ट्रांसपोर्ट ही होता है।  पिछले शनिवार मैंने ऑटो-रिक्शा का इस्तेमाल किया। चालक एक महिला थी, जानी-पहचानी सी लग रही थी।  आख़िरकार मैनें उस से पूछा, "मुझे लगता है मैंने आपको कहीं देखा है। क्या आप पहले अपने पति के साथ सैक्टर ३१ की मार्केट में चाय बेचने का कारोबार करते थे? आपको शायद याद नहीं मैंने कई दफ़ा आप की दुकान से चाय पी है।"  महिला चालक कुछ चौंकी, बोली, "हाँ साहब जी। पति की मौत के बाद अब मैं ऑटो चलाती हूँ।" उसने भारी मन से जवाब दिया  "ओह! यह सुनकर बहुत दुख हुआ। क्या आपने दूसरी शादी कर ली है?" मैंने पूछा  "नहीं साहब जी। मैंने दूसरी शादी नहीं की है, अब करेगा भी कौन।"  "तो फिर आपने सिंदूर और मंगलसूत्र क्यों पहन रखा है?"  साहब जी, ऐसे दरिंदों की इस मुल्क़ में कमी नहीं है जो मेरे जैसी असहाय, बेवाओं को निगलने के लिए हरदम तैयार रहते हैं। "जंगली जानवरों" के हमले से बचने के लिए मैं एक खुशहाल शादीशुदा महिला का स्वांग रचती हूँ, सुहागिन की तरह श्रंगार करती हूँ।" ...

शाम की सैर

 शाम की सैर मेरे लिए अहम है।   ख़ुद से रूबरू होने के लिए, क़ुदरत को निहारने के लिए, अपने दोस्तों से मिलने जुलने के लिए।  मुख़्तलिफ़ क़िस्म के लोग रास्ते में मिलते हैं, बेसब्री से मेरा इंतज़ार करते हैं।  इन सभी के दिलों में मेरे लिए बेहद ख़ुलुस है। परमात्मा का शुक्रगुज़ार हूँ।  रघुराम सड़क किनारे साईकिल रिपेयर का काम करता है। मेरा हम-उम्र है। मेरी साईकिल की सर्विस, मरम्मत बखूबी करता है।  शाम को सबसे पहले रघु से ही मिलना होता है, राम राम होती है।  कुछ दूर जाने पर मंदिर के पुजारी के दर्शन होते हैं, हर बार चाय के लिए आग्रह करते हैं।  "पंडित जी, हमारे साथ चाय पीने के बाद सैर के लिए चले जाना। चुस्ती फुर्ती रहेगी।"  कभी मूड होता है तो बिस्किट या समोसे ले जाता हूँ। पुजारियों के साथ मंदिर के प्रांगण में चाय की चुस्कियों के साथ शास्त्रों, उपनिषदों पर विचार विमर्श होता है।  गंगा राम सड़क किनारे हेलमेट बेचने का काम करता है। मुझे देख कर हमेशा सैल्यूट करता है। कई बार मना करता हूँ, कहता हूँ कि मैं कोई फौजी नहीं हूँ।  "पर साहब आपके रंग ढंग तो ...

दो किस्म के लोग

  ये जहाँ सिर्फ़ दो ही किस्म के लोग को रास आता है - मूर्खों और शातिरों को।  मूर्खों को तो दीन दुनिया की कुछ भी ख़बर नहीं होती इसलिए वे अपनी ही मौज में रहते हैं, दुनिया के कायदे कानूनों से नावाक़िफ़।  और शातिर जो भी चाहते हैं, अमूमन हासिल कर ही लेते हैं - धोखे से या फिर रसूख़दारों की खुशामद करके।  हैरत की बात यह है कि दो ही तरह के लोग हरदम दुखी रहते हैं, इस संसार में अनुपयुक्त हैं - बुद्धिजीवी और भावनात्मक।  यह दुनिया दुखों, तकलीफ़ों से भरी पड़ी है। नरम दिल इन दुखों का तहेदिल से ख़ात्मा करना चाहता है, दीन दुखियों को सुकून देना चाहता है।  पर विडम्बना यह है कि उसके पास ज़रूरी साधन नहीं होते। पैसा और ताकत सिर्फ़ संगदिलों को ही मयस्सर है। इसलिए वह दुखी रहता है।  मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने बिल्कुल सही कहा है, "बुद्धिमान लोगों को खुशी मिलना सबसे दुर्लभ चीज़ है। असल बात तो यह है कि यह दुनिया उनके लिए बनी ही नहीं है।"  दानिशवर बहुत जल्द इस दुनिया की असलियत को देख, समझ लेते हैं।  उन्हें इल्म हो जाता है कि यहाँ सब कुछ चलायमान है। सब कु...