दो किस्म के लोग
ये जहाँ सिर्फ़ दो ही किस्म के लोग को रास आता है - मूर्खों और शातिरों को। मूर्खों को तो दीन दुनिया की कुछ भी ख़बर नहीं होती इसलिए वे अपनी ही मौज में रहते हैं, दुनिया के कायदे कानूनों से नावाक़िफ़। और शातिर जो भी चाहते हैं, अमूमन हासिल कर ही लेते हैं - धोखे से या फिर रसूख़दारों की खुशामद करके। हैरत की बात यह है कि दो ही तरह के लोग हरदम दुखी रहते हैं, इस संसार में अनुपयुक्त हैं - बुद्धिजीवी और भावनात्मक। यह दुनिया दुखों, तकलीफ़ों से भरी पड़ी है। नरम दिल इन दुखों का तहेदिल से ख़ात्मा करना चाहता है, दीन दुखियों को सुकून देना चाहता है। पर विडम्बना यह है कि उसके पास ज़रूरी साधन नहीं होते। पैसा और ताकत सिर्फ़ संगदिलों को ही मयस्सर है। इसलिए वह दुखी रहता है। मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने बिल्कुल सही कहा है, "बुद्धिमान लोगों को खुशी मिलना सबसे दुर्लभ चीज़ है। असल बात तो यह है कि यह दुनिया उनके लिए बनी ही नहीं है।" दानिशवर बहुत जल्द इस दुनिया की असलियत को देख, समझ लेते हैं। उन्हें इल्म हो जाता है कि यहाँ सब कुछ चलायमान है। सब कु...