क्या अब भी त्यौहारों की कुछ अहमियत है?
परमात्मा ने सिर्फ दिन, रात बनाए हैं। त्यौहारों, रीति रिवाजों से उसका कोई ताल्लुक़ नहीं। त्यौहार, चाहे किसी भी मज़हब के हों, इंसानी दिमाग की उपज हैं। इनका ईजाद हमारे बुज़ुर्गों ने दो वजहों से किया : (क) पहले के ज़माने में मनोरंजन के साधनों की बेशुमार कमी थी, अमूमन एक ही वसीला होता था। इसी वसीले की बदौलत हर घर में बच्चों की भरपूर फ़स्ल होती थी। (ख) आवा-जाही के अच्छे साधन नहीं थे। रिश्तेदारों, दोस्तों का मेल मिलाप बमुश्किल था। त्यौहारों के बहाने लोग एक दूसरे से मिलते, ख़ैरियत पूछ लेते थे। मौजूदा माहौल में मनोरंजन के साधनों की भरमार है। हवाई जहाज़, रेलवे के ज़रिए कहीं भी, कभी भी आसानी से पहुँचा जा सकता है। क्या अब भी त्यौहारों की कुछ अहमियत है? मेरा मानना है कि आज कल जिस तरीके से त्यौहार मनाए जा रहे हैं, नुक्सान ज़्यादा और फ़ायदे ना के बराबर हैं। पटाखों, विसर्जनों के ज़रिए आब-ओ-हवा को गंदा किया जा रहा है, जानवरों, परिंदों को परेशान किया जा रहा है। कुर्बानियों, बलियों के नाम पर बेज़ुबान पशुओं की, अपनी जीभ के स्वाद के ख़ातिर, न...