यह कैसी सुहागिन
अक़्सर मैं आश्रम शनिवार को जाता हूँ। आमतौर पर आवाजाही का ज़रिया पब्लिक ट्रांसपोर्ट ही होता है। पिछले शनिवार मैंने ऑटो-रिक्शा का इस्तेमाल किया। चालक एक महिला थी, जानी-पहचानी सी लग रही थी। आख़िरकार मैनें उस से पूछा, "मुझे लगता है मैंने आपको कहीं देखा है। क्या आप पहले अपने पति के साथ सैक्टर ३१ की मार्केट में चाय बेचने का कारोबार करते थे? आपको शायद याद नहीं मैंने कई दफ़ा आप की दुकान से चाय पी है।" महिला चालक कुछ चौंकी, बोली, "हाँ साहब जी। पति की मौत के बाद अब मैं ऑटो चलाती हूँ।" उसने भारी मन से जवाब दिया "ओह! यह सुनकर बहुत दुख हुआ। क्या आपने दूसरी शादी कर ली है?" मैंने पूछा "नहीं साहब जी। मैंने दूसरी शादी नहीं की है, अब करेगा भी कौन।" "तो फिर आपने सिंदूर और मंगलसूत्र क्यों पहन रखा है?" साहब जी, ऐसे दरिंदों की इस मुल्क़ में कमी नहीं है जो मेरे जैसी असहाय, बेवाओं को निगलने के लिए हरदम तैयार रहते हैं। "जंगली जानवरों" के हमले से बचने के लिए मैं एक खुशहाल शादीशुदा महिला का स्वांग रचती हूँ, सुहागिन की तरह श्रंगार करती हूँ।" ...