वक़्त बदल गया है...
वक़्त बदल गया है, मुद्दे बदल गए है, मक़सद बदल गए है।
जवानी के दौर में मैं अच्छी खासी जॉगिंग, स्प्रिंट और पुश-अप्स लगाता था।
उद्देश्य एक ही था - ख़ूबसूरत लड़कियों को प्रभावित करना, पटाना।
कुछ दिनों पहले मैंने कुछ जवान लड़कों और लड़कियों को जॉगिंग करते देखा।
उन्होंने अपने मोबाइल फोनों को अपनी बांहों पर बांधा था।
मेरे पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि उन्होंने ऐप डाउनलोड किया है जो उनके कदमों का हिसाब किताब रखता है।
दस हज़ार से ज़्यादा कदम चलने पर उन्हें चीज़ों पर भारी छूट मिलती है।
जॉगिंग और डिस्काउंट अब दोनों साथ-साथ चलते है।
अक़्सर मै एक बुज़ुर्ग दंपत्ति को पार्क में दोपहर में टहलते देखता हूँ।
कल दोपहर को मैं किसी काम से पार्क से गुज़र रहा था, उसी बुज़ुर्ग दंपत्ति को बेंच पर बैठा देखा।
"अंकल जी, मैं अक़्सर आपको दोपहर में टहलते हुए देखता हूँ। आज आप बैठे है। तबीयत तो ठीक है ना?"
"हाँ बेटा, सब कुछ दुरुस्त है।" बुज़ुर्ग ने जवाब दिया
"वैसे अंकल जी अब गर्मी हो गई है। टहलने के लिए सुबह का समय अच्छा होता है।" मैंने सुझाव दिया
"हमारे टहलने का कोई तय समय नहीं है। जैसे ही हमारा बेटा दफ़्तर के लिए निकलता है, मैं अपनी पत्नी को पार्क में टहलाने ले जाता हूँ।" उस बुज़ुर्ग ने कहा
"ऐसा क्यों?" मैंने उत्सुकता से पूछा
"अगर हम घर पर रहते हैं तो हमारी बहू हमें कामों में लगा देती है - बच्चों को ट्यूशन ले जाना, बाज़ार से सामान लाना, खाना बनाना - ताकि उसे किटी पार्टियों में जाने या सोने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।" उस बुज़ुर्ग ने कड़वाहट भरे लहजे़ में कहा
अपने कुत्तों की जंजीरें पकड़े हुए, कुछ "टहलने वाले" असल में अपने से कहीं ज़्यादा ताक़तवर जर्मन शेफ़र्ड और पिट बुल कुत्तों द्वारा "घसीटे" जाते हैं।
मज़े की बात यह है कि उनकी "सैर" का मक़सद और समय पूरी तरह से उनके कुत्तों द्वारा ही तय किया जाता है।
जैसे ही उनके लाड़-प्यार से पाले हुए पालतू कुत्ते फ्रेश हो लेते हैं, उनकी सैर भी समाप्त हो जाती है।
मैं अब ब्रिस्क वॉक और कभी कभार जॉगिंग करने की क़ोशिश करता हूँ।
लेकिन अब इरादा एक ही होता है - थक कर चूर हो जाना, गहरी नींद में खो जाना ताकि मेरा अतीत मुझे ढ़ूंढ़ ना सके, परेशान ना कर सके।
वक़्त और मक़सद दोनों बदल गए है।
~ संजय गार्गीश ~
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