शाम की सैर
शाम की सैर मेरे लिए अहम है। ख़ुद से रूबरू होने के लिए, क़ुदरत को निहारने के लिए, अपने दोस्तों से मिलने जुलने के लिए। मुख़्तलिफ़ क़िस्म के लोग रास्ते में मिलते हैं, बेसब्री से मेरा इंतज़ार करते हैं। इन सभी के दिलों में मेरे लिए बेहद ख़ुलुस है। परमात्मा का शुक्रगुज़ार हूँ। रघुराम सड़क किनारे साईकिल रिपेयर का काम करता है। मेरा हम-उम्र है। मेरी साईकिल की सर्विस, मरम्मत बखूबी करता है। शाम को सबसे पहले रघु से ही मिलना होता है, राम राम होती है। कुछ दूर जाने पर मंदिर के पुजारी के दर्शन होते हैं, हर बार चाय के लिए आग्रह करते हैं। "पंडित जी, हमारे साथ चाय पीने के बाद सैर के लिए चले जाना। चुस्ती फुर्ती रहेगी।" कभी मूड होता है तो बिस्किट या समोसे ले जाता हूँ। पुजारियों के साथ मंदिर के प्रांगण में चाय की चुस्कियों के साथ शास्त्रों, उपनिषदों पर विचार विमर्श होता है। गंगा राम सड़क किनारे हेलमेट बेचने का काम करता है। मुझे देख कर हमेशा सैल्यूट करता है। कई बार मना करता हूँ, कहता हूँ कि मैं कोई फौजी नहीं हूँ। "पर साहब आपके रंग ढंग तो ...