शाम की सैर
शाम की सैर मेरे लिए अहम है।
ख़ुद से रूबरू होने के लिए, क़ुदरत को निहारने के लिए, अपने दोस्तों से मिलने जुलने के लिए।
मुख़्तलिफ़ क़िस्म के लोग रास्ते में मिलते हैं, बेसब्री से मेरा इंतज़ार करते हैं।
इन सभी के दिलों में मेरे लिए बेहद ख़ुलुस है। परमात्मा का शुक्रगुज़ार हूँ।
रघुराम सड़क किनारे साईकिल रिपेयर का काम करता है। मेरा हम-उम्र है। मेरी साईकिल की सर्विस, मरम्मत बखूबी करता है।
शाम को सबसे पहले रघु से ही मिलना होता है, राम राम होती है।
कुछ दूर जाने पर मंदिर के पुजारी के दर्शन होते हैं, हर बार चाय के लिए आग्रह करते हैं।
"पंडित जी, हमारे साथ चाय पीने के बाद सैर के लिए चले जाना। चुस्ती फुर्ती रहेगी।"
कभी मूड होता है तो बिस्किट या समोसे ले जाता हूँ। पुजारियों के साथ मंदिर के प्रांगण में चाय की चुस्कियों के साथ शास्त्रों, उपनिषदों पर विचार विमर्श होता है।
गंगा राम सड़क किनारे हेलमेट बेचने का काम करता है। मुझे देख कर हमेशा सैल्यूट करता है। कई बार मना करता हूँ, कहता हूँ कि मैं कोई फौजी नहीं हूँ।
"पर साहब आपके रंग ढंग तो फौजी अफ़सर जैसे हैं।"
ऐसा है तो इसकी वज़ह सख़्त एनसीसी की ट्रेनिंग है जिसने सीधा, तन कर चलना सिखाया।
प्रदीप दास बहुत उम्दा मूर्तिकार है। बंगाली है। खुद को "प्रदीप" ना कह कर "प्रोदीप" कहता है। बंगाली एक्सेंट।
मंदिर में एक झोंपड़ी बना कर अपनी पत्नी और छोटी बेटी मोहिनी के साथ रहता है। माँ दुर्गा, सरस्वती, गणेश जी के बहुत सुंदर विग्रह बनाता है।
मेरी पत्नी सोनिया का मोहिनी से बेहद लगाव था। अक़्सर मोहिनी के लिए नए कपड़े, मिठाई, चॉकलेट ले जाती थी।
सोनिया के कहने पर ही प्रदीप ने मिट्टी के खिलौने, बर्तन भी बनाने शुरू किए ताकि काम सारा साल चलता रहे।
कुछ दिनों पहले प्रदीप ने मुझसे कहा, "सर, बिटिया ऐयरफोर्स स्कूल में पढ़ना चाहती है।"
"पर क्यों? मोहिनी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ तो रही है। क्या स्कूल अच्छा नहीं है।"
"सर, स्कूल में कोई कमी नहीं है। पर मोहिनी फौज में अफ़सर बनना चाहती है। ऐयरफोर्स स्कूल से पढ़ने के बाद मंज़िल आसान हो जाती है।"
"यह तो अच्छी बात है। मोहिनी का फार्म जमा करवा दो। अगर जगह होगी तो लॉटरी सिस्टम के ज़रिए दाख़िला होगा।"
"सर, लॉटरी में नाम नहीं निकला। सर, आप की अफ़सरों से जान पहचान है, आप किसी को कहो।"
"देखो प्रदीप मेरी आदत नहीं है कि मैं दोस्ती का नाजायज़ फ़ायदा उठाऊँ और सिफ़ारिश करूँ।
मेरी बात सुनकर प्रदीप उदास हो गया।
जब मैं उसकी झोंपड़ी से बाहर निकला तो मैंने मोहिनी को दरवाज़े पर खड़ा देखा।
ज़हिर है उसने हमारी बातें सुन ली थी। उस का चेहरा लटका हुआ था, आंसू बह रहे थे। उसने मुझे नमस्ते भी नहीं कहा।
थोड़ा आगे गया तो कभी मोहिनी का उदास चेहरा सामने आया, कभी सोनिया का मोहिनी के लिए प्यार।
वापस मुडा। प्रदीप से मोहिनी के फार्म की फोटोस्टेट कॉपी ली।
कल प्रदीप मिला। बेहद खुश था। मोहिनी का दाख़िला हो गया था।
तभी मोहिनी आई, हाथ में चॉकलेट थी, मुझे दी और कहा, "अंकल, आंटी मेरे लिए ऐसी ही चॉकलेट लाती थी। अभी मेरे पास एक ही है। जब मैं अफ़सर बन जाऊँगी तो हर रोज़ आपके लिए एक डिब्बा लाऊँगी।
~ संजय गार्गीश ~
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