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कर्मों का हिसाब किताब

मेरे एक पुराने दोस्त ने मुझ से अपना दर्द सांझा किया, "शर्मा जी, मैं जिंदगी से बेहद तंग हूँ। दफ़्तर से घर जाने को ज़रा भी मन नहीं करता। अब दो-तीन साल बाद मेरी रिटायरमेंट है। सोच कर भी ख़ौफ़ लगता है कि फिर मै मुक्कमल वक़्त जहन्नुम जैसे घर में कैसे बिताऊंगा।"  "घर तो आदमी सुकूँ के पलों के लिए ही जाता है। पर आप को घर जहन्नुम क्यों लगता है। मैं कुछ समझा नहीं। खुल कर बताईये।"  "दोस्त, आप को तो पता है कि मेरे दो बच्चे हैं, बेटा और बेटी। बदक़िस्मती से दोनों ही मेरे इख़्तियार में नहीं है। बेटी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही है। बेटे ने तालीम मुकम्मल कर ली है। ना वह नौकरी करता है, ना कोई बिजनेस। दोनों के रईसी शौंक है - महंगे कपड़े, गाड़ियां, महंगे होटलों, शराब खानों में जाना। रात को बहुत लेट या फिर सुबह ही शराब के नशे में घुत हो कर घर वापस आते हैं। मेरी पत्नी इन दोनों की हरकतों की वजह से परेशान रहती है, बीमार रहती है।"  "पर आप इन्हों को पैसे क्यों देते हो।"  "अगर पैसे ना दूं तो झगड़ा करते हैं, गालियाँ देते हैं, घर छोड़ कर जाने की धमकी देते हैं। समाज में अपनी...