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Showing posts from July, 2026

बुढ़ापे में आर्थिक स्वतंत्रता ज़रूरी है

 मेरे एक जानकार ने कई रोज़ पहले दर्दनाक किस्सा सुनाया।  दिल्ली में एक मकान से बदबू आ रही थी। पड़ोसियों ने पुलिस को इत्तिला दी। दरवाज़े को तोड़ा गया, पुलिस ने देखा कि उम्रदराज़ मकान मालिक का शव बिस्तर पर पड़ा था। मौत की वजह - हार्ट अटैक।  पड़ोसियों ने बताया कि कई मर्तबा वे ही बुज़ुर्ग को खाना, दवाइयाँ खरीद कर देते थे।  अलमारी खोलने पर एक डायरी मिली जिसमें उसके बेटे और बेटी का फोन नंबर था।  बेटा अमेरिका में बहुत बड़ा डाक्टर है। फोन करने पर उसने कहा, "इस लाश के लिए मैं क्या सारे काम छोड़कर आऊं। आप ने जो इस का करना है कर दिजिए।"  मुंबई में रह रही बेटी का जवाब था, "मैं शादीशुदा हूँ, दो बच्चे हैं। अपने हस्बैंड, बच्चों को देखना पड़ता है। सॉरी, मैं वक़्त नहीं निकाल सकती।"  क्या आप जानते हैं कि भारतीयों में सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी क्या है?  एक आम भारतीय अपने बच्चों की बेहतरीन परवरिश, तालीम, शादी पर बेइंतहा खर्च करता है। सोचता है कि ये सब लान्ग टर्म इन्वेस्टमेंट है, मुनासिब रिटर्न उसे बुढ़ापे में मिलेगा जब वह कमाने योग्य नहीं होगा।  बस यही सोच सबसे बड़ी भ्...

ये सारी क़ायनात वक़्त के इख़्तियार में है

 ये सारी क़ायनात वक़्त के इख़्तियार में है। वक़्त सब कुछ बदल देता है -  हालात, विचार।  मैंने १९८६ में दसवीं जमात पास की, सरकार ने १०+२ सिस्टम लागू कर दिया।  स्कूलों में १०+२ जमातों को पढ़ाने का बंदोबस्त नहीं था सो मैंने डीएवी कालेज, सैक्टर १०, चंडीगढ़ में दाखिला लेने की सोची।  इसी कॉलेज में पॉंच साल पढ़ा - दो साल १०+२, तीन साल बी ए आनर्स।  विषयों के बारे में इल्म नहीं था सो आर्ट्स के विषय फार्म में भर दिए।  उस वक़्त कॉलेज के प्रिंसिपल डा. किशन सिंह आर्य जी थे।  उन्होंने मुझे, एक और लड़के समीर पाल सिंह को अपने दफ़्तर में बुलाया।  "बेटा, आप के तो दसवीं में बहुत अच्छे नंबर हैं, आर्ट्स क्यों भरा? मैं आपको नॉन मेडिकल दे रहा हूँ।"  उसी वक़्त समीर पाल सिंह से मेरी पहली मुलाक़ात हुई जो बाद में पक्की दोस्ती में तब्दील हुई।  समीर द लॉरेंस स्कूल - सनावर, कसौली (हिमाचल प्रदेश) से दसवीं तक पढ़ा था। पिता जी के सिलीगुड़ी (वेस्ट बंगाल) में चाय के बागान थे। अमीर बाप का बेटा पर बेहद विनम्र।  +२ में मेरे नंबर बेहतरीन आए पर ना जाने क्यों साइंस विष...

कर्मों का हिसाब किताब

मेरे एक पुराने दोस्त ने मुझ से अपना दर्द सांझा किया, "शर्मा जी, मैं जिंदगी से बेहद तंग हूँ। दफ़्तर से घर जाने को ज़रा भी मन नहीं करता। अब दो-तीन साल बाद मेरी रिटायरमेंट है। सोच कर भी ख़ौफ़ लगता है कि फिर मै मुक्कमल वक़्त जहन्नुम जैसे घर में कैसे बिताऊंगा।"  "घर तो आदमी सुकूँ के पलों के लिए ही जाता है। पर आप को घर जहन्नुम क्यों लगता है। मैं कुछ समझा नहीं। खुल कर बताईये।"  "दोस्त, आप को तो पता है कि मेरे दो बच्चे हैं, बेटा और बेटी। बदक़िस्मती से दोनों ही मेरे इख़्तियार में नहीं है। बेटी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही है। बेटे ने तालीम मुकम्मल कर ली है। ना वह नौकरी करता है, ना कोई बिजनेस। दोनों के रईसी शौंक है - महंगे कपड़े, गाड़ियां, महंगे होटलों, शराब खानों में जाना। रात को बहुत लेट या फिर सुबह ही शराब के नशे में घुत हो कर घर वापस आते हैं। मेरी पत्नी इन दोनों की हरकतों की वजह से परेशान रहती है, बीमार रहती है।"  "पर आप इन्हों को पैसे क्यों देते हो।"  "अगर पैसे ना दूं तो झगड़ा करते हैं, गालियाँ देते हैं, घर छोड़ कर जाने की धमकी देते हैं। समाज में अपनी...