ये सारी क़ायनात वक़्त के इख़्तियार में है

 ये सारी क़ायनात वक़्त के इख़्तियार में है। वक़्त सब कुछ बदल देता है -  हालात, विचार। 


मैंने १९८६ में दसवीं जमात पास की, सरकार ने १०+२ सिस्टम लागू कर दिया। 

स्कूलों में १०+२ जमातों को पढ़ाने का बंदोबस्त नहीं था सो मैंने डीएवी कालेज, सैक्टर १०, चंडीगढ़ में दाखिला लेने की सोची। 

इसी कॉलेज में पॉंच साल पढ़ा - दो साल १०+२, तीन साल बी ए आनर्स। 

विषयों के बारे में इल्म नहीं था सो आर्ट्स के विषय फार्म में भर दिए। 

उस वक़्त कॉलेज के प्रिंसिपल डा. किशन सिंह आर्य जी थे। 

उन्होंने मुझे, एक और लड़के समीर पाल सिंह को अपने दफ़्तर में बुलाया। 

"बेटा, आप के तो दसवीं में बहुत अच्छे नंबर हैं, आर्ट्स क्यों भरा? मैं आपको नॉन मेडिकल दे रहा हूँ।" 

उसी वक़्त समीर पाल सिंह से मेरी पहली मुलाक़ात हुई जो बाद में पक्की दोस्ती में तब्दील हुई। 

समीर द लॉरेंस स्कूल - सनावर, कसौली (हिमाचल प्रदेश) से दसवीं तक पढ़ा था। पिता जी के सिलीगुड़ी (वेस्ट बंगाल) में चाय के बागान थे। अमीर बाप का बेटा पर बेहद विनम्र। 

+२ में मेरे नंबर बेहतरीन आए पर ना जाने क्यों साइंस विषयों में मेरी दिलचस्पी बन ना पाई सो बी ए में ऐडमिशन ले लिया। 

समीर ने भी मेरी देखा देखी बी ए में दाखिला ले लिया। 

हम अक़्सर सैक्टर १५ की मार्केट जाते - परांठे खाने, चाय पीने, तफड़ी मारने, लड़कियां देखने। 

कॉलेज के बगल में ही लड़कियों का कॉलेज था। 

बी ए फाइनल इयर में समीर को उसी कॉलेज की एक ख़ूबसूरत छात्रा, गीता, से इश्क हो गया। 

अक़्सर हम तीनों इंडियन कॉफी हाउस सैक्टर १७ में डोसा, कॉफी का लुत्फ़ उठाते। 

उस दौरान के सी थिएटर - सैक्टर १७, में सुपरमैन, बैटमैन की फिल्में दिखाई जाती थी जो गीता को बहुत पसंद थी। 

दोनों ने शादी करने का फैसला किया। दोनों के माता पिता भी राज़ी थे। 

समीर को चंडीगढ़ की आब-ओ-हवा बेहद पसंद थी, शादी के बाद यही सेटल होने की सोच रहा था। 

पर क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। 

गीता किसी कार्यवश सैक्टर १७ जा रही थी, पीछे से तेज़ रफ़्तार बस ने टक्कर मारी। उस हादसे में गीता की मौके पर ही मौत हो गई। 

गीता की मृत्यु के बाद समीर बहुत दुखी रहने लगा। 

जो चंडीगढ़ कभी उस के जिगर का टुकड़ा था वह अब दर्दनाक नासुर बन गया। 

अपनी तालीम मुक़म्मल होने पर समीर सिलीगुड़ी चला गया। 

समीर ने शादी नहीं की, चाय के बागान संभाल रहा है। 

कुछ रोज़ पहले मैंने समीर को फोन किया, कहा, "भाई कभी आ कर मिल जाओ, हालचाल पूछ जाओ। मेरी मौत पर ही आओगे क्या?" 

मेरी बात सुन कर समीर जज़्बाती हो गया, कहा, "मेरे भाई, किसी वक़्त चंडीगढ़ मेरी जान था लेकिन अब मुझे चंडीगढ़ बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। इस शहर के सर पर गीता के खून का इल्ज़ाम है। बेहतर है आप ही मेरे पास आ जाओ।" 

~ संजय गार्गीश ~

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