कभी गुल-ए-बहार...

 कभी गुल-ए-बहार 

कभी ख़ार ही ख़ार 


कभी अज़ाब बेशुमार 

कभी बेवज़ह करार 


कभी आँसूओं की धार 

कभी नेमतें हज़ार 


कभी तपिश-ए-रेगज़ार 

कभी बसंत की बयार


नहीं कोई पाया पार 

यही ज़िंदगी का सार 


यही ज़िंदगी का सार 


गुल-ए-बहार : बसंत का गुलाब, 

ख़ार : काँटे, अज़ाब : दुख, करार : चैन 

तपिश-ए-रेगज़ार : रेगिस्तान की गर्मी, 

बयार : हवा 


~ संजय गार्गीश ~ 

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