क्या वक़्त वाकई क़ीमती है?

 पिछले हफ़्ते आश्रम में एक ख़ूबसूरत नौजवान से मुलाक़ात हुई। गुफ्तगू के दौरान मालूम हुआ कि उसने एक नामचीन इंस्टीट्यूट से मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की तालीम ली है। 


"सर, अक़्सर मुझे लगता है कि मेडिटेशन से मैं वक़्त बर्बाद कर रहा हूँ। कुछ भी ना सोचना, कुछ भी ना करना, कुछ भी ना कहना, सर क्या यह व्यर्थ में वक़्त गंवाना नही है? सर, वक़्त मूल्यवान है!" नौजवान ने मुझसे सवाल किया 


"बेटा, आप कहते हो कि वक़्त क़ीमती है। क्या आप क़ीमती वस्तु की परिभाषा बता सकते हो?" मैंने पूछा 


"सर, इकोनॉमिक्स के मुताबिक़ जो चीज़ कम होती है, वो मूल्यवान होती है। 


"बेटा आपने बजा फरमाया। अमूमन कमी ही कीमत तय करती है। पर क्या समय कम होता है, निश्चित होता है?" मैंने पूछा


"सर, हमारे को यही पढ़ाया गया है।" 


"बेटा, क्योंकि हमारे एजुकेशन सिस्टम पर अंग्रेज़ों का प्रभाव है इसलिए आपको ऐसा पढ़ाया गया है। "वक़्त मूल्यवान है", यह एक अंग्रेज़ी कहावत है।"


"मैं कुछ समझा नही सर। कृपया खुल कर बताएं।" नौजवान ने उत्सुकता से कहा 


"बेटा, पश्चिम में, ईसाईयों को, पुनर्जन्म में विश्वास नही है। उनके लिए यही ज़िंदगी अंतिम है। समय सीमित है। इसी सीमित समय में बेइंतहा ख़्वाहिशों को पूरा करना है। इसीलिए पश्चिम में हर शख़्स भागता दौड़ता ही नज़र आता है। मानसिक तनाव, डिप्रेशन आम बात है। पर पूर्व में, भारतीय सनातन धर्म का पुनर्जन्म में पूरा यक़ीन है। हमारे ऋषियों ने, गौतम बुद्ध ने, गुरु गोबिंद सिंह जी ने पुनर्जन्म को हक़ीक़त बताया है। 


दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा रचित "विचित्र नाटक' में गुरु जी ने लिखा है कि पूर्वजन्म में उन्होंने हेमकुंड पर्वत पर कठोर तपस्या की थी। 


क्योंकि हर मौत जन्म का कारण बनती है, हर जन्म में मौत छुपी है। इसलिए पूर्वी सोच के मुताबिक़ वक़्त मूल्यवान नहीं क्योंकि ये सीमित नहीं है। अगर कोई ख़्वाहिश इस बार पूरी नहीं होती तो कुछ फ़िक्र की बात नहीं, अगली दफ़ा सही। ज़्यादा दौड़ धूप में पूर्व के बाशिंदे विश्वास नहीं रखते। शायद इसीलिए पुराने भारत में डिप्रेशन, शुगर जैसी बिमारियों का नामोनिशान नहीं था।"


"पर सर आप कैसे कह सकते है कि पुनर्जन्म यक़ीनन है।" 


"बेटा, कुदरत की हर चीज़ वृत्ताकार रुप में ही घूमती है, यानि ना आदि ना अंत। धरती, सितारे, ग्रह सभी घूमते है। मौसम भी घूमते हैं। गर्मी के बाद वर्षा, फिर सर्दी, बसंत और दोबारा गर्मी। 


ठीक ऐसे ही वक़्त भी सीधी लाइन में नहीं चलता, घूमता है। जन्म से जवानी, जवानी से बुढ़ापा, बुढ़ापे से जिस्म की मौत। मृत्यु के बाद फिर जन्म। यही अटल हक़ीक़त है। वक़्त और ब्रह्माण्ड की व्यापकता का इल्म सिर्फ मेडिटेशन से ही मुमक़िन है बेटा।" 


नौजवान मेरे जवाब से राज़ी हुआ। उठ कर मेरे पांव छुए और मेडिटेशन करने बैठ गया। 


~ संजय गार्गीश ~

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