तन्हाई से निजात

 उम्र के आखिरी पड़ाव में आमतौर पर दो कठिन समस्याएं देखने को मिलती है - तेजी से बढती महंगाई में सीमित आमदनी से अपने जिस्म और रूह को एकजुट रखना, अकेलेपन से ख़ुद को महफ़ूज़ रखना। 


मेरे कई दोस्त, हम जमाती फाइनेंशियल एक्सपर्ट है। लोगों को फाइनेंशियल लिटरेसी, प्लानिंग के बारे में जानकारी देते है ताकि ज़िन्दगी की शाम में क़िल्लत ना आए। 


माली समस्या का तो साफ हल है। 


पर तन्हाई को जीतना नामुमकिन सा लगता है। 


ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि जैसे जैसे इंसान बुज़ुर्ग होता जाता है, अकेलेपन के काले साए गहरे होते जाते है। 


मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली साहब ने सही फरमाया है "जुबां मिली है मगर हम-जुबां नहीं मिलता"। 


आज मुझे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बड़े ओहदे से, हाल ही में, रिटायर्ड हुए एक जानकार मिले। 


"सर, कंपनी में जिन लोगों के साथ मैंने रोज़ दस-बारह घंटे बिताए, हंसी मजाक किया, दुख-सुख सांझा किया, रिटायरमेंट के बाद उन लोगों ने मेरी सुधबुध भी नही ली। और तो और, मेरे बच्चों के पास भी मेरे लिए वक़्त नही है। कोई भी सलाह देने की कोशिश करता हूँ तो कहते है कि आप तो पुराने ज़माने के हो, समय बदल गया है। सर्विस के दौरान लोग मुझे बेहद इज्जत देते थे। दफ्तर से घर आता था तो घर वाले मेरे आगे पीछे घूमते थे। पर अब ऐसा लगता है कि मैं किसी दूसरे घर से आया हूँ।" 


"सर, सहकर्मी और दोस्तों में फर्क होता है। आपने शायद दोनों को एक ही समझा। सहकर्मी को आप से नही, आप के ओहदे से ही मतलब रहता है।" मैनें कहा 


नब्बे प्रतिशत से ज्यादा फाइनेंशियल स्कैम ऐसे बुज़ुर्गों के साथ ही होते है जो तन्हाई के शिकार है। दूसरों से बतियाने की इच्छा इतनी प्रबल होती है कि ये बुज़ुर्ग ठगों की बातों पर यकीन कर लेते है क्योंकि ये उनकी बातें इत्मिनान से सुनते हैं। 


सिर्फ दो ही किस्म के लोग तन्हाई पसंद होते है - कलमकार और साधक। 


मेरा मानना है कि कलम को संभालना हर किसी के बस की बात नहीं। यह हुनर पैदाइशी है। 


इसलिए बोझिल तन्हाई से निजात पाने के लिए अध्यात्म से जुड़ना बेहद ज़रूरी है। 


अध्यात्म का किसी मज़हब, मंदिर, गुरूद्वारा या मस्जिद से कोई मतलब नहीं है। 


अध्यात्म ख़ुद को ख़ुद से मिलाती है। किसी चीज की जुस्तुजू नहीं रहती। 


हिमालय की बर्फ़िली चोटियों पर, अंधेरी कंदराओं मे, घने जंगलों के बीचों-बीच भी यदि साधक अकेला होने के बावजूद लगातार आनंद भाव मे रहता है, खुद की कंपनी इंज्वाय करता है तो यक़ीनन यह अध्यात्म का ही सिला है। 



संजय गार्गीश 

सदस्य 

चिन्मय मिशन केन्द्र

चंडीगढ़ प्रदेश 

चंडीगढ़। 


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