आजकल के दौर की बड़ी समस्या

 आजकल के दौर में सबसे बड़ी समस्या वैवाहिक संबंधों को लेकर है। तकरीबन अस्सी फीसदी विवाहों की मियाद महज़ एक साल ही है, पंद्रह फीसदी तीन साल से ज्यादा नहीं टिक पाते। 

कारण : (क) विवाह के बाद भी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखना, धोखा देना (ख) एक दूसरे से जरूरत से ज्यादा अपेक्षा रखना (ग) पति पत्नी में गहन मित्रता ना होना 

हो सकता है कि शादी से पहले मेरे जीवन में लड़कियों का आना जाना हो पर शादी के बाद मेरी जिंदगी और ज़ेहन में सिर्फ मेरी जीवन संगिनी ही रही। 

एक प्रतिष्ठित भारतीय वायु सेना अधिकारी की इकलौती बेटी होने के नाते मेरी पत्नी के माता-पिता उसे बहुत प्यार करते थे और उसके साथ राजकुमारी जैसा बर्ताव करते थे। 

हालाँकि उसके माता-पिता का शादी के कुछ साल बाद ही इंतक़ाल हो गया था फिर भी वह उन्हें बहुत ज़्यादा याद करती थी। 

एक दफ़ा शाम की सैर के वक़्त मेरी पत्नी ने एक अनोखी गुज़ारिश की, "संजय, आज मैं वायु सेना अधिकारियों के आवासीय परिसर में जाना चाहती हूँ। चलो वहाँ अंदर टहलते हैं।" उसकी ज़िद देखकर मुझे हैरानगी हुई। 

अपने एक अधिकारी दोस्त की मदद से मैं उसे कड़ी सुरक्षा वाले परिसर के अंदर ले गया। 

कुछ मिनट चलने के बाद, वह क्वार्टर नंबर 3126A के सामने रुक गई। 

"संजय, मैंने 1987 से 1990 तक, तीन साल अपने माता-पिता के साथ इसी क्वार्टर में बिताए थे। इसके बाद हम जोरहाट (असम) - हमारी नई पोस्टिंग, चले गए। मैं इस क्वार्टर के कमरे और पिछे का बगीचा देखना चाहती हूँ। क्या यह मुमकिन है?" 

वहाँ रहने वाले, स्क्वाड्रन लीडर विजय गुरुंग और उनकी पत्नी इतने दयालु थे कि उन्होंने हमें अंदर आने दिया, हमारे लिए चाय तैयार करवाई। 

"संजय, यह वही कमरा है जहाँ मेरी माँ ने मेरा चौदहवाँ जन्मदिन मनाया था। चूँकि मेरे पिताजी कुछ समय के लिए अवंतीपोरा (जम्मू-कश्मीर) में तैनात थे, इसलिए माँ ने अकेले ही सारी चीज़ें संभाली थीं। उन्होंने मेरे और मेरे दोस्तों के लिए स्वादिष्ट कुकीज़ और नाश्ता बनाया था।" सोनिया ने नम आँखों से, पुरानी यादों में खोकर कहा 

"सर, क्या आप हमें अपना पिछे का बगीचा दिखा सकते हैं? मेरे पिताजी ने वहाँ गुलमोहर का एक पौधा लगाया था। क्या वह अभी भी वहाँ है?" मेरी पत्नी ने उस अधिकारी से बच्चों जैसी जिज्ञासा के साथ पूछा 

"हाँ मैम, वह अभी भी वहीं है।" अधिकारी ने जवाब दिया और हमें पिछवाड़े की ओर ले गया 

एक ऊँचे, शानदार गुलमोहर के पेड़ के पास खड़े होकर मेरी पत्नी विचारों में खो गई। 

मैं साफ़ तौर पर महसूस कर सकता था कि उसकी आँखों में आँसू उमड़ रहे थे। 

कुछ देर बाद हमने उस अधिकारी से विदा ली, उसकी पत्नी को मेहमाननवाज़ी के लिए शुक्रिया किया और अपने घर की ओर चल पड़े। 

रास्ते में, काफी देर तक चुप रहने के बाद सोनू ने कहा, "संजय, जब मैं उस गुलमोहर के पेड़ के सामने खड़ी थी, तो मुझे कुछ अजीब सा महसूस हुआ। मुझे लगा जैसे मेरे पिताजी वहीं थे, प्यार से मुझे मेरे निकनेम से पुकार रहे थे और मुझे गले लगाने की कोशिश कर रहे थे।" यह कहते ही, उसने अपने अंदर दबी भावनाओं को बाहर निकाल दिया और अपना सिर मेरी छाती पर रखकर रोने लगी। 

उसे दिलासा देने के लिए मैंने उसे गले लगा लिया। 

कभी-कभी पतियों को एक अलग ही भूमिका निभानी पड़ती है। 

उन्हें पिता की भूमिका भी निभानी पड़ती है! 

~ संजय गार्गीश ~

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