आध्यात्मिक मार्ग पर लाज़मी चीज़ें
"आध्यात्मिक मार्ग आसान नहीं है। साथ ही, यह हर किसी के लिए भी नही है।
आज के ज़माने में ऐसे बेशुमार लोग मिल जाएँगे जो खुद को परमात्मा, परमात्मा का नुमाइंदा होने का दावा करते हैं। पर ये ज़्यादातर ढ़ोंगी हैं।
मेरा पुख़्ता यकीन है कि इस जन्म और पिछले जन्मों के संस्कारों और प्रवृत्तियों के कारण ही कोई शख़्स असल में आध्यात्मिकता की ओर खिंचता है।
ऐसा शख़्स परमात्मा के लिए गहरी तड़प महसूस करता है। वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों की सलाह के बावजूद अपनी दौलत और परिवार को त्याग देता है।
राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) ने सत्य की खोज में अपना राज-पाट, परिवार और ऐशो-आराम की ज़िंदगी त्याग दी थी।
मेरे गुरु स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती जी संन्यास लेने से पहले "नेशनल हेराल्ड" अखबार में बेख़ौफ़, मशहूर पत्रकार थे। वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रूप से शामिल थे। लेकिन महज़ पच्चीस साल की उम्र में उन्होंने सब कुछ त्याग दिया और हिमालय में स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी से दीक्षा ली।
कई अमीर लोगों, उच्च अधिकारियों ने साधु या योगी बनने के लिए अपने सुख, दुनियावी ओहदों को छोड़ा है।
अपने खुद के आध्यात्मिक अनुभवों से मैं कह सकता हूँ कि डाक्टर, इंनजिनियर बनना आसान है पर एक साधु बनना बेहद मुश्किल काम है। अपनी इंद्रियों को इंद्रिय-विषयों से हटाना कोई बच्चों का खेल नही है।"
"सर, आध्यात्मिक सफ़र पर निकले एक साधक के लिए किन चीज़ों पर ध्यान देना ज़रूरी है।" एक साधक ने सवाल किया
"बेटा, आध्यात्मिक सफ़र में ये चीज़ें लाज़मी है :
(क) कम से कम ज़रूरतें : ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें जमा न करें। इससे केवल ध्यान भटकेगा। जब मन को महंगी कारों की किश्तें चुकाने या महँगी चीज़ों की हिफ़ाज़त करने की चिंता सताती रहती है तो जप, ध्यान एकाग्रता से नही हो सकता।
(ख) सादा जीवन : सादा जीवन जीने से विचार काबू में रहते है। जब ज़रूरतें कम होती हैं तो इंसान को ज़्यादा सोचना नहीं पड़ता। विचार जितने कम होंगे, मन में उतना ही सुकून होगा।
(ग) अकेले रहने की आदत डालें : रोज़ कुछ घंटों के लिए तन्हा रहे। जब कोई अकेला होता है तो वह आत्म-निरीक्षण करने लगता है, परम तत्व के बारे में सोचने लगता है।
सांसारिक लोगों को भी हर दिन कम से कम एक घंटे के लिए बिल्कुल अकेला रहना चाहिए और अपनी ही संगति का आनंद लेना चाहिए। यदि कोई अपनी ही संगति का आनंद नहीं ले सकता तो वह दूसरों से यह उम्मीद कैसे कर सकता है कि वे उसकी संगति का आनंद लेंगे।
(घ) मीठा बोलें, कम बोलें : तभी बोलना चाहिए जब बेहद ज़रूरी हो। एक साधक को लंबे समय तक मौन व्रत का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। मौन रहने से व्यक्ति को बहुत लाभ होता है। फ़िज़ूल की बातचीत सिर्फ थकावट लाती है।
कोई भी वजनी बात केवल मौन से ही निकलती है।" मैनें जवाब दिया
~ संजय गार्गीश ~
Comments
Post a Comment