कर्मों का खेल
कल आश्रम में एक नौजवान ने बहुत वाजिब सवाल किया, "सर, क्या वजह है कि नेक इंसानों को मुश्किलातों से रू-ब-रु होना पड़ता है जबकि बदकार हर किस्म का लुत्फ़ ले रहे है।"
नौजवान का सवाल सुन कर मुझे मेरा गुज़रा वक़्त याद आ गया।
यही सवाल पहली दफ़ा मेरे ज़हन मे तब आया था जब मैं पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से इकोनॉमिक्स में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रहा था।
इस एक सवाल ने मुझे बेहद परेशाँ किया।
जवाब की खोज ने बेशुमार भटकाया।
क्योंकि मैं डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का पदाधिकारी था, इसलिए अक़्सर धार्मिक संस्थानों के प्रोग्रामों में जाना लगा रहता था।
इस वजह से साधु-संतों के साथ मेरा काफ़ी मेल-जोल था।
सवाल के जवाब की जुस्तुजू मुझे रामकृष्ण मिशन ले गई।
स्वामी रामानंद जी उस वक़्त संस्था के प्रमुख थे, अच्छी जान पहचान थी।
संन्यास लेने से पूर्व वह एक नामचीन न्यूरो-सर्जन थे, अमेरिका से तमाम तालीम हासिल की थी।
जब मैंने अपना सवाल स्वामी जी के सामने रखा तो उन्होंने मुस्कुरा कर कहा था, "बेटा, वाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण जी ने भी श्री राम जी से यही प्रश्न पूछा था।"
"तब श्री राम जी ने क्या उत्तर दिया था?" मैंने उत्सुकतापूर्वक पूछा।
"श्री राम जी ने उत्तर दिया कि अच्छे लोगों को अपने पिछले जन्मों के कुछ बुरे कर्मों के कारण कष्ट भोगने पड़ते है। इन कष्टों को भोग लेने के बाद उन्हें दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता। वे मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं, आवागमन से निजात पा लेते हैं।"
"वो तो ठीक है स्वामी जी पर दुष्कर्मी, पापी ऐशोआराम की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं। यह कैसे?"
"बेटा, देखने में भले ही ऐसा प्रतीत होता है कि कुकर्मी या दुष्ट व्यक्ति बड़े आराम से जीवन जी रहा है परंतु वास्तविकता यह है कि उसका जीवन नरक से कम नहीं होता।
अपने बुरे कर्मों के फलों को भोगने के लिए उसे इस मृत्युलोक में बार बार जन्म लेना पड़ता है, नीची योनियों की माताओं के पेट में बार बार लटकना पड़ता है।"
~ संजय गार्गीश ~
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