सबसे बड़ा ख़ौफ़

 "सर, मौत का डर सबसे बड़ा डर है, हर किसी को सताता है। क्या इस से छुटकारा पाया जा सकता है?" एक बुज़ुर्ग ने सवाल किया 

"आप सही कहते हो। मौत का ख़ौफ़ बेहद बड़ा ख़ौफ़ बन गया है। इसी की वज़ह से कई मुख़्तलिफ़ ख़ौफ़ पैदा होते है। इनसे निजात पाने के लिए हम लोगों से जुड़ते है, रिश्ते बनाते है, धन-दौलत का आडंबर लगाते है। हमें यह गलत-फ़हमी हो जाती है कि हमारी दौलत, रूतबा, मरासिम इन सब ख़ौफ़ों का ख़ात्मा कर देंगे। पर बावजूद इनके बेचैनी, दहशत क़ायम रहती है। 

"सर, मौत का खेल तो पैदा होते ही शुरू हो जाता है। पुरानी कोशिकाएं मरती है, नई जगह लेती है। बचपन मरता है जवानी आती है। जवानी तबाह होती है बुढ़ापे की ख़ातिर। बुढा़पे के बाद जिस्म की मौत होती है। मौत के बाद फिर पैदाइश। जीवन-चक्र चलता रहता है, बेअंत है। मौत असल में बदलाव को ही कहा जाता है। अगर बदलाव नही होगा, तरक्की भी नही होगी। कैटरपिलर मरेगा तो ही तितली बनेगा। बीज मरेगा तो ही आसमान छूता शजर बनेगा।" मैंने कहा 

"तो हमें मौत से नहीं डरना चाहिए।" 

"हमें इस बात का ख़ौफ़ होना चाहिए कि हम फिर से किसी माँ के पेट में उल्टे ना लटक जाए, फिर से इस संसार यानि दुखालय में ना आए।" 

"पर यह कैसे मुमकिन है।" 

"आप एलांते माॅल या कोई अन्य माॅल जाते हो?" मैंने पूछा 

"हाँ।" 

"सांसारिक चीज़ों के लिए कशिश ही हमको माॅल पहुँचाती है। ठीक ऐसे ही चीज़ों, रिश्तों में मोह ही हमें आवागमन से निकलने नही देता। हम बार बार जन्म लेते है। जब यह एहसास हो जाता है कि संसार महज़ धोखा है इसका सार सिर्फ शून्य है, हर सांसारिक सुख वहम है वास्तव में दुख का ही दूसरा नाम है, तब माॅल या संसार का खिंचाव खत्म हो जाता है। तब लहर मर जाती है अपनी मंज़िल हासिल कर लेती है, अनंत समंदर हो जाती है।"


~ संजय गार्गीश ~

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