क्या महज़ नास्तिक होना गलत है, पाप है?

 "सर, मैं किसी भगवान को नहीं मानती, कोई तीर्थ यात्रा नहीं करती ना ही किसी धार्मिक किताब में मेरा यक़ी है। क्या मैं गलत हूँ?" 


पिछले शनिवार आश्रम में एक महिला ने मुझसे यह सवाल किया। 

सवाल अहम था। 

क्या महज़ नास्तिक होना गलत है, पाप है? 

बिल्कुल नहीं। 

मैंने बेशुमार ऐसे ख़ुदा-परस्त भी देखे हैं जो ज़्यादातर वक़्त मंदिरों, मस्जिदों में गुज़ारते हैं, हर धार्मिक समागम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं पर दिल के बेहद मैले हैं। 

मक्कारी बेइंतहा है, ईर्ष्या है, सिरे का लालच है, चुगलखोर हैं, दूसरों के लिए दिल में सिर्फ बेरहमी है। 

मुझे याद है कुछ वक़्त पहले मैं पैदल रास्ते पर चल रहा था। अचानक पीछे से तेज़ रफ़्तार बाइक निकली, मैं ब-मुश्किल बचा। 

गुस्से में मैंने बाइक सवार को ठेठ पंजाबी में "कर्णप्रिय" श्लोक सुनाए, रुकने को कहा। 

बाइक सवार थोड़ी दूरी पर रूका। मैं उसके पास गया। देखा कि वह धार्मिक वेशभूषा में है। 

"आपको शर्म आनी चाहिए। एक धर्म गुरु होने के नाते आप का कर्तव्य है कि आप क़ानून की पालना कर के मिसाल क़ायम करें। क्या आपको मालूम है कि इस तरह पैदल यात्री को गहरी चोट लग सकती है, मौत भी हो सकती है। यह रास्ता बाइक के लिए नहीं है।" 

"मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। पैदल यात्री को ही संभल कर चलना चाहिए।" 

यह कह कर वह ज़ाहिल बाइक पर भाग गया। 

क्या आप ऐसे आस्तिकों को पसंद करेंगे? 

क्या आप ऐसे नास्तिकों से नाख़ुश होंगे जो दूसरों की मदद को तैयार रहते हैं, साफ़ दिल हैं, क़ानून के दायरे में ही अपना कारोबार करते हैं? 

ज़रा सोचिए। 

यह सवाल मैं आप सभी के लिए छोड़ता है। 


~ संजय गार्गीश ~ 


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