Posts

पर्याप्तता नहीं सन्तुष्टा प्राप्त करें

  एक मध्यवर्गीय परिवार में पैदा होने की वजह से मुझे यह लगता था कि बेशुमार पैसा और पद बेहद ज़रूरी है क्योंकि इनसे हर ख्वाहिश पूरी की जा सकती है। पैसे और पद से ही हर परेशानी से निजात मुमकिन है।  इसलिए इन्हें पाने के लिए मैं मुसलसल कोशिश करता रहता था।  लेकिन जैसे-जैसे मैं सफल लोगों से मिलता गया, मुझे एहसास हुआ कि वे भी मुझसे अलग नहीं थे।  प्रचुर पैसे और बेहतरीन ओहदे पाने के बावजूद भी तकरीबन सभी ज़्यादा से ज़्यादा पाने की होड़ में लगे थे।  पैसा और पद ही उनकी परेशानी की वजह बन रहे थे!  मैंने महसूस किया कि अमूमन कामयाब लोग बीमार है। वे अपनी असीम हवस के बोझ से हरदम थके-थके रहते है।  बेशुमार होने के बावजूद भी बेहद असंतुष्ट रहते है। इसीलिए अब मै पैसे, पद और प्रतिष्ठा से प्रभावित नहीं होता।  मैं अब ब्रांडेड कपड़ों, मोबाइल फोन या अन्य ब्रांडेड वस्तुओं के आधार पर लोगों का मूल्यांकन नहीं करता हूँ।  मेरे मुताबिक़ व्यक्ति अपने विचारों, अपने व्यवहार द्धारा ही पहचाना जा सकता है, ब्रांडेड वस्तुओं से नहीं।  अब सवाल यह उठाया जाता है कि पैसा और ख्वाहिशें कित...

दोस्त यही जिंदगानी है

  बस इतनी सी कहानी है  ये दुनिया बहता पानी है।  जो चीज़ तूने सच मानी है  सच पूछो सब फ़ानी है।  चल सूरज की बात करें  रात सियाह बितानी है।  वज़ह हर वैराग की  पीड़ा कोई पुरानी है।  इमारत टूटी सजानी है दोस्त यही ज़िंदगानी है।  फ़ानी : नश्वर, सियाह : काला रंग  ~ संजय गार्गीश ~ 

क्या खोया क्या पाया

  क्या खोया क्या पाया  कुछ समझ ना आया।  चंद सांसों की ख़ातिर  जिंदगी को बेच आया।  खुदी को मिटा कर  मैंने ख़ुद को पाया।  कहीं और जाया जाए  जहाँ है देखा दिखाया।  मेरे ख़्याल और अल्फ़ाज़  बस यही मेरा सरमाया।  जब सब जगह वो समाया  कौन अपना कौन पराया।  खुदी : अहंकार, सरमाया : धन-दौलत ~ संजय गार्गीश ~ 

मेरी सत्य की ख़ोज २

  अपने अध्यात्मिक सफ़र के दौरान मै ऐसे कई साधुओं, भिक्षुओं, मौलवियों, फ़ादरों से मिला जिन्होंने मुझे तो जिंदगी का उद्देश्य बे-लगाव रहना बताया पर मैंने उन्हें अपने धर्म से, अपने परिवार से, अपने संकीर्ण विचारों से, अपनी बेशकीमती चीज़ों से लगाव करते हुए पाया।  ऐसे लोग ख़ुद तो भ्रमित होते ही है, दूसरों को भी अपने निजी स्वार्थ की ख़ातिर गुमराह करते है।  एक ऐसे महानुभाव से भी मुलाक़ात हुई जिन्हें अपने धर्म की क़िताब मुँह-ज़बानी याद थी। जब मैंने उनसे जीवन के मंसूबे के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, "ख़्वाहिशों का ख़ात्मा करना"। मुलाक़ात के दौरान एक शागिर्द चाय लेकर आया। चाय में शक्कर कम थी पर मैंने ज़यादा गौर नही किया। पर महानुभाव ने शागिर्द पर बेशुमार गुस्सा किया। यह देख कर मैं समझ गया कि मुहतरम की मीठी चाय की ख़्वाहिश भी अभी बरकरार है। मैंने उनसे रूख़सत ली।  धर्मग्रंथों को पढ़ने से, ज़कात या दान देने से, धर्म स्थलों पर जाने से आप अच्छे इंसान तो बन सकते है पर विश्वास रखें, आप को सत्य की प्राप्ति हरगिज़ नहीं हो सकती।  सांसारिक ज्ञान साझा किया जा सकता है परन्तु विडम्बना...

मेरी सत्य की ख़ोज १

  कुछ अध्यात्मिक दोस्तों, स्टूडेंट्स ने काफ़ी समय पहले फ़रमाइश की थी कि सत्य की जुस्तुजू के दौरान हुए अपने तजुर्बों को शेयर करूँ।  लेकिन अपनी जीवन संगिनी के बेवक़्त इंतिक़ाल की वज़ह से मैं उस वक़्त शेयर नहीं कर पाया।  अब मैं थोड़ा संभला हूँ, सो आप सभी के साथ अपने अनुभव साझा कर रहा हूँ।  मुद्दा लंबा और गहरा है, इसलिए मैं दो पोस्टें लिखूँगा।  "ज़िंदगी के मायने क्या है? "क्या खाना, पीना, सोना, सम्भोग करना ही जीवन का मक़सद है? ऐसे कई सवालों का सिलसिला मेरे ज़हन में उस वक़्त शुरू हुआ जब मैं काॅलेज में तालीम हासिल कर रहा था।  दोस्तों, इन सवालों के जवाबों की तलाश में या फिर यूँ कहें कि सत्य की ख़ोज में मैं दर-ब-दर भटका।  सभी मज़हबों के धर्म गुरुओं, साधकों से मुलाक़ात की। धर्म स्थलों पर गया, तस्सली-बख्श जवाब मयस्सर ना हुए।  पंजाब में एक नामी-गिरामी स्वामी एक नामचीन डेरे की अध्यक्षता कर रहे थे।  हज़ारों की तादाद में लोग उनके प्रवचन सुनने आते थे।  एक बार मैं भी उनके प्रवचन सुनने गया और प्रवचन के पश्चात उनसे कुछ समय मांगा।  उन्होंने कुछ देर मे...

साथी बहुत है मेरे

साथी बहुत है मेरे  रातें घनेरी उजले सवेरे  फूलों से उलफ़त है मुझे कांटे सब है मेरे  छांव हम-नवा है मेरी  और धूप साथ है मेरे  यह धरती घर है मेरा  मेरे अंबर में है बसेरे  साथी बहुत है मेरे उलफ़त : प्यार, हम-नवा : समर्थक ~ संजय गार्गीश ~

क्या भगवान वाकई हैं?

  कल शाम मेरी मुलाक़ात एक जानकार से हुई। गुफ़्तगू के दौरान उसने कहा, "शर्मा जी, मुझे भगवान या खुदा में कुछ भी यकीं नहीं है। मैं आज जो कुछ भी हूँ अपने दम से हूँ।"  "तो फिर आपका जन्म भी आप ही के दम से हुआ होगा?" मैंने मुस्कुरा कर कहा  कई दफ़ा मेरी मुलाक़ात ऐसे लोगों से होती है जो इस बात में फख्र महसूस करते है कि वे नास्तिक है।  क्या वाकई भगवान या खुदा है या यह महज़ मन का वहम है। इस मुद्दे पर मैंने कई किताबें पढ़ी, चिंतन किया।  आखिरकार मै इस नतीजे पर पहुँचा कि दो ही कारणों से कोई भी शख़्स सर्वोच्च शक्तिमान के अस्तित्व को नहीं मानता। या तो :  (क) उसने जिंदगी मुकम्मल तौर से नहीं देखी या जी।  (ख) उसने जिंदगी के विषय में मनन नहीं किया।  सुप्रसिद्ध गज़ल गायक जगजीत सिंह जी ने एक बहुत ही अच्छा, मशहूर भजन गाया है - हे राम हे राम। जग में सांचों तेरो नाम, हे राम हे राम।  क्या आपको पता है कि यह भजन उर्दू ज़ुबाँ के नामचीन शायर सुदर्शन फ़ाकिर जी ने लिखा है। शराब के बेहद शौकीन, सुदर्शन फ़ाकिर ने तमाम उम्र सिर्फ शराब और शबाब को ही तवज्जोह दी। लेकिन कुछ घटनाओं ...