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Showing posts from January, 2026

कभी गुल-ए-बहार...

 कभी गुल-ए-बहार  कभी ख़ार ही ख़ार  कभी अज़ाब बेशुमार  कभी बेवज़ह करार  कभी आँसूओं की धार  कभी नेमतें हज़ार  कभी तपिश-ए-रेगज़ार  कभी बसंत की बयार नहीं कोई पाया पार  यही ज़िंदगी का सार  यही ज़िंदगी का सार  गुल-ए-बहार : बसंत का गुलाब,  ख़ार : काँटे, अज़ाब : दुख, करार : चैन  तपिश-ए-रेगज़ार : रेगिस्तान की गर्मी,  बयार : हवा  ~ संजय गार्गीश ~ 

एक गुज़ारिश

 इस बात से ब-ख़ूबी है ख़बर  मुश्किल है मेरी हर राहगुज़र  उतर गया है दिल से दहर क़फ़स बन गया ये शहर एक गुज़ारिश है तुम से मगर  हो जाओ मेरे हमसफर अगर  दर्द-ओ-अलम मेरे जाऐंगे ठहर  राहें रोशन होंगी हर पहर  दहर : दुनिया क़फ़स : क़ैद-ख़ाना दर्द-ओ-अलम : दुख और तकलीफ़ें ~ संजय गार्गीश ~ 

तन्हाई से निजात

 उम्र के आखिरी पड़ाव में आमतौर पर दो कठिन समस्याएं देखने को मिलती है - तेजी से बढती महंगाई में सीमित आमदनी से अपने जिस्म और रूह को एकजुट रखना, अकेलेपन से ख़ुद को महफ़ूज़ रखना।  मेरे कई दोस्त, हम जमाती फाइनेंशियल एक्सपर्ट है। लोगों को फाइनेंशियल लिटरेसी, प्लानिंग के बारे में जानकारी देते है ताकि ज़िन्दगी की शाम में क़िल्लत ना आए।  माली समस्या का तो साफ हल है।  पर तन्हाई को जीतना नामुमकिन सा लगता है।  ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि जैसे जैसे इंसान बुज़ुर्ग होता जाता है, अकेलेपन के काले साए गहरे होते जाते है।  मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली साहब ने सही फरमाया है "जुबां मिली है मगर हम-जुबां नहीं मिलता"।  आज मुझे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बड़े ओहदे से, हाल ही में, रिटायर्ड हुए एक जानकार मिले।  "सर, कंपनी में जिन लोगों के साथ मैंने रोज़ दस-बारह घंटे बिताए, हंसी मजाक किया, दुख-सुख सांझा किया, रिटायरमेंट के बाद उन लोगों ने मेरी सुधबुध भी नही ली। और तो और, मेरे बच्चों के पास भी मेरे लिए वक़्त नही है। कोई भी सलाह देने की कोशिश करता हूँ तो कहते है कि आप तो पुराने ज़माने के ह...