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Showing posts from December, 2025

संन्यास क्या है

 बेहद खुशी होती है जब देखता हूँ कि पढ़े लिखे नौजवान काॅरपोरेट सेक्टर के बड़े ओहदों को छोड़ कर अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रहे है, अपने वजूद को जानने की क़ोशिश कर रहे है।  कल आश्रम में ऐसे ही एक नौजवान ने सवाल किया, "सर, मैंने यह महसूस किया है कि हर साल दूसरे मुल्कों के बाशिंदे भारत मे संन्यास लेने के लिए बेशुमार तादाद मे आते है और उन लोगों की संन्यास के लिए ईमानदारी काब़िल-ए-तारीफ है, हम से कई गुना ज्यादा है। ऐसा क्यों?"  "बेटा, सच्चाई यह है कि यहाँ बहुत ही कम लोग है जो हकीकत मे अध्यात्मिक है। ज्यादातर फरेबी है, गरीब घरों से है। इन्हों के लिए अध्यात्म रोज़ी-रोटी है, अय्याशी का साधन है। इन्हों के ज़हन मे हरदम संसार ही रहता है, ये सिर्फ सांसारिक वस्तुओं का ही मनन करते है।" वास्तव मे संन्यास का मार्ग संसार से ही जाता है। बगैर संसार को समझे संन्यास लेना बेईमानी है।  अगर कोई सही मे संन्यासी होगा तो या तो वह अमीर और अक्लमंद होगा या सिर्फ अक्लमंद।  अमीर हो पर विवेकवान ना हो तो संन्यास नामुमकिन है।"  "वो कैसे सर?"  "इकोनॉमिक्स मे एक सिद्धांत है जिसे लागत-ल...

मंज़िल ए इश्क़

 मंज़िल ए इश्क़ का बहुत  पहले मिल जाना था  सिर्फ अपनी हस्ती को ही  तो हमें मिटाना था।  मेरा अक्स आईने में कोई मायने नहीं रखता  मेरे अक्स को जो देखे बस उसी को जानना था।  राहें आसॉं होती मयस्सर  होती हर शय बदले मौसमों में हमें भी  बदल जाना था।  ऐ नादान, लबों पर तबस्सुम  को सजाना था  फिर उन्हें अपने ग़म-ओ-अलम  सुनाना था।  अक्स : परछाई  मयस्सर : हासिल होना  शय : वस्तु  तबस्सुम : मुस्कान ग़म-ओ-अलम : दुःख और दर्द  ~ संजय गार्गीश ~

नई उम्मीद

  जब धूप यक़ीनी है तो  साया भी बेशक़ होगा  इसने भी इत्तिला नहीं दी  वो भी यकायक होगा।  बस उसके मंसूबों की  तामील हो रही है  जो तूने नहीं सोचा  वो भी बेशक़ होगा।  ऐ दोस्त मेरे कब तक  खुद को बचा पाओगे  तुम को भी प्यार होगा  वो भी अचानक होगा।  इत्तिला : सूचना  यकायक : एकाएक मंसूबा : योजना  तामील : पूरा करना  ~ संजय गार्गीश ~