संन्यास क्या है
बेहद खुशी होती है जब देखता हूँ कि पढ़े लिखे नौजवान काॅरपोरेट सेक्टर के बड़े ओहदों को छोड़ कर अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रहे है, अपने वजूद को जानने की क़ोशिश कर रहे है। कल आश्रम में ऐसे ही एक नौजवान ने सवाल किया, "सर, मैंने यह महसूस किया है कि हर साल दूसरे मुल्कों के बाशिंदे भारत मे संन्यास लेने के लिए बेशुमार तादाद मे आते है और उन लोगों की संन्यास के लिए ईमानदारी काब़िल-ए-तारीफ है, हम से कई गुना ज्यादा है। ऐसा क्यों?" "बेटा, सच्चाई यह है कि यहाँ बहुत ही कम लोग है जो हकीकत मे अध्यात्मिक है। ज्यादातर फरेबी है, गरीब घरों से है। इन्हों के लिए अध्यात्म रोज़ी-रोटी है, अय्याशी का साधन है। इन्हों के ज़हन मे हरदम संसार ही रहता है, ये सिर्फ सांसारिक वस्तुओं का ही मनन करते है।" वास्तव मे संन्यास का मार्ग संसार से ही जाता है। बगैर संसार को समझे संन्यास लेना बेईमानी है। अगर कोई सही मे संन्यासी होगा तो या तो वह अमीर और अक्लमंद होगा या सिर्फ अक्लमंद। अमीर हो पर विवेकवान ना हो तो संन्यास नामुमकिन है।" "वो कैसे सर?" "इकोनॉमिक्स मे एक सिद्धांत है जिसे लागत-ल...